Monday, November 15, 2010

भूत और नेता

भूतों का दल पहुँच गया नेताजी के द्वार|
नेता जी सो रहे थे बे-सुध पाँव पसार||
एक ने कहा ले चलो इसे "भूत-संसार"|
देखें इसका असर क्या होता हमपर यार||
तुरत दुसरे ने कहा ये तो है ग़द्दार|
इसको अपने लोक में ले जाना बेकार||
यह सुनकर कहने लगा भूतों का सरदार|
अगर जगा तो करेगा तुम पर अत्याचार||
यहीं बूथ लुट्वायेगा कर देगा बेकार|
आस्तीन का सांप है ना करना ऐतबार||
इंसानी गलती करो नहीं तुम्हें अधिकार|
नेता पर विस्वास कर नहीं मिले कुछ सार||
इसको ले जाना नहीं छोडो यहीं विचार|
और कहीं पर ढूंढते अपना नया शिकार||

Sunday, November 14, 2010

लहर का खेल रहता है

लहर का खेल रहता है, किनारे टूट जाते हैं,
समय करवट बदलता है, सहारे छूट जाते हैं|
 

अनोखी चीज़ है होनी, न कोई जोर चलता है,
न जाने वक्त का रुख किस घडी, किस ओर होता है|
 

अचानक आसमाँ का रँग, बादल लूट लेते हैं,
नज़र प्यासी भटकती है, नज़ारे रूंठ जाते हैं|
 

अचानक मिल गया कोई, कि मंजिल मिल गयी जैसे,
अचानक चल दिया कोई, कि जैसे प्राण तन में से|
 
न जाने कौन सा रिश्ता, नज़र से जन्म लेता है,
कि अनजानी निगाहों के इशारे, लूट जाते हैं|
 

शिकायत भी करें किस से, किसे ठहराएँ हम दोषी,
अगर उँगली उठाएंगे, तो खुद बन जायेंगे दोषी|
 

न जाने हुक्म किसका है, सभी चुप मान लेते हैं,
 कि दुश्मन बनके हमको ह़ी, हमारे लूट जाते हैं|

Thursday, October 28, 2010

(****इंसानियत****)

ये दुनिया बड़ी ज़ालिम, मज़हब नहीं समझती,
उन्माद की फिजां को, मज़हब का नाम देती|
पैदा हमें किया है, ईश्वर ने सिर्फ इंशां,
ये रंग भर बदलकर, मज़हब में बाँट देती|
'मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना,
एक वक्त में सुना था, मैंने भी ये तराना|
पर आज क्या हुआ है, दुनिया का वो फ़साना,
उन्मत्त हो गया है, मज़हब का हर दिवाना|
इंसान बनके आया, था मैं भी इस जहाँ में,
हिन्दू को मिल गया तो, हिन्दू बना दिया है|
संसार ने सिखाया, दुनिया में भेद करना,
इंसानियत का दुश्मन, मुझको बना दिया है|
आया था इस जहां में, तन-मन था स्वेत गंगा,
दुनिया ने हाथ रखकर, मैला बना दिया है|
इंसानियत की हद को, मज़हब में बाँट डाला,
इंसान को ह़ी उसका, दुश्मन बना दिया है|
मज़हब की डोर तोड़ो, इस भेद को मिटा दो,
होली दिवाली क्रिसमस, को ईद तुम मना लो|
हम सब हैं भाई-भाई, दिल से गले लगा लो,
नफरत की इस फिजां को, इंसानियत बना दो|

Sunday, October 17, 2010

ॐ सांई गाओ

"जीवन को अपने पावन बना लो-२
ॐ सांई गाओ सांई नाम गुनगुना लो..
अनमोल जीवन को यूँ न खपाओ-२
बची हैं जो श्वासें उनको व्यर्थ ना गंवाओ...
हर श्वांस में-२ सांई नाम को बसा लो...
ॐ सांई गाओ..........................
मिला है ये मानव जन्म खुद को संभालो-२
ह्रदय लौ को अपनी पारब्रह्म में लगालो...
एक दिन मिलेंगे सांई-२ ह्रदय में बसा लो...
ॐ सांई गाओ.................................
नश्वर है दुनियां इससे मोह तुम छुड़ा लो-२
साश्वत प्रभु को अपने ह्रदय में बसा लो...
सांई की शरण में आकर-२ परम ज्ञान पा लो...
ॐ सांई गाओ...................................
एक दिन है जाना फिर क्यों देह को संभालो-२
प्राण छूटने से पहले आत्म ज्ञान पा लो....
पुनर्जन्म से अपने-२ आप को बचा लो....
ॐ सांई गाओ..............................
अब तक किये जो सारे पाप तुम मिटा लो-२
सांई नाम गंगा में गोते लगा लो.......
बाबा मुझे भी अपनी-२ शरण में बुला लो...
ॐ सांई गाओ..................................

Saturday, September 25, 2010

प्यार


प्यार में खोकर कोई दिन-रात कुछ भाता नहीं,
प्यार जब होने लगे तो वक्त भी कटता नहीं,
खामोश रहकर भी फिजां हर वक्त तड़पाती रहे,
आएगा कोई सोचकर हर पल ये दिल जलता रहे,
दिल लगी में कोई भी उम्मीद बहलाती नहीं,
प्यार जब होने..................................
आँखों का क्या है दोष जब दिल में तड़प और प्यास है,
अनजान सा जाना हुआ चेहरा जो दिल के पास है,
क्या करे कमबख्त मन दिल को कोई भाता नहीं,
प्यार जब होने.......................................
चाहता तो हूँ मगर कैसे कहूँ मन की व्यथा,
हर जवां दिल की ज़माने ने सुनी है वो कथा,
पर बिना बोले कोई मुझको समझता ह़ी नहीं,
प्यार जब होने.........................................
मैं इधर और तुम उधर दुनियां को इसकी क्या खबर,
दिल की बातें दिल में हैं कैसे कहूँ ऐ हमसफ़र,

प्यार तो है पाक यह दुनियां समझती ह़ी नहीं,
 प्यार जब होने...... ..................................

Wednesday, August 11, 2010

अरे यार तुमको मैं क्या क्या बताऊँ,
मेरे दिल के जख्मों को कैसे दिखाऊं||
मुझे मेरे अपनों ने जी भर रुलाया,
ज़हर जाम भर भर के हर दम पिलाया,
वो अपने हैं कैसे में बदला चुकाऊ|
मेरे दिल के ................
जिसे अपना समझा उसी ने दगा दी,
जिसे प्यार किया उसी ने सजा दी,
सज़ा की क़यामत को कैसे भुलाऊ|
मेरे दिल के ...............
जो थे प्यारे बचपन के साथी हमारे,
उन्होंने भी हमसे किये अब किनारे,
मग़र दोष उन पर मैं कैसे लगाऊ|
मेरे दिल के ...............
कई प्यार करते थे दौलत की खातिर,
मिले हैं बहुत ऐसे शातिर मुसाफ़िर,
जो सच्चा हो हमदम कहाँ से मैं लाऊं|
मेरे दिल के ..................
मिले थे जो कल वो लगे सबसे प्यारे,
मग़र आज तक भी हुए ना हमारे,
उन्हें दिल की धड़कन मैं कैसे सुनाऊ|
मेरे दिल के .................
हरेक दिल में है आज मौका परस्ती,
सुना मौत है ज़िन्दगी से भी सस्ती,
तो इस ज़िन्दगी से क्या आशा लगाऊ|
मेरे दिल के .................

Sunday, July 4, 2010

वजूद

वजूद वह न मिट सके,
न घट सके न बंट सके,
उदास हो भी शाम तो,
न पास आये रंज-ओ-गम|
न हों कभी भी गम-ज़दा,
न खुद से हो कभी खफ़ा,
ये है खुदा से इल्तजा,
न गम सताए यार को|
कि ज़िन्दगी की राह में,
जो हों कभी दुस्वारियां,
तो चीरकर सीना हवा का,
सिर्फ बढ़ना है सदा|
यह मैं नहीं कहता हूँ सुन,
है वक़्त की किलकारियां,
जो दे गया दस्तक अभी,
है वजूद का वो फ़ल-सफ़ा|

Friday, April 30, 2010

भारत माता

भारत माता है मेरी इसके लिए मैं,
सर कटाकर भी सदा लड़ता रहूँगा|
"मैं" नहीं तो क्या हुआ वो तो रहेगा,
सांस भी जिसने अभी तक ली नहीं है|
पर यूँ ही तुमसे ग़दर का हर जनम,
हर घडी आवाहन मैं करता रहूँगा||
तुम वो दानव हो जिसे अपने न उसके,
माँ - बहन - बच्चे - बड़े दिखते नहीं हैं|
इसलिए तो रौंदकर निर्दोष जानें,
कह रहे हो मजहवी जेहाद है ये|
पर निकम्मों ध्यान से सुन लो जरा,
"मैं" हर जनम इस ज़ुल्म से लड़ता रहूँगा||
क्या छल - कपट - धोखा तेरा ईमान है,
क्या बम - धमाके - आग तेरी शान है?
है दम तो आकर सामने दिखला ज़रा,
इंसानियत तुझको खड़ी ललकारती है|
है  भरी  तेरे  जिगर  में  आग  जो,
उस आग को अपने लहू से रोक दूंगा||
हैं  तेरे  ना-पाक  दिल  में  जो  इरादे,
वो  कभी  पूरे  न  होंगे  ज़ुल्म-जादे|
इंसानियत में घोलता है क्यों ज़हर?
नामो-निशां मिट जायेगा कुछ कर फ़िकर|
आजा शरण में आज भी होगी महर,
वर्ना उठा खंज़र ज़िगर में घोप दूंगा||

Monday, April 5, 2010

मायके का डब्बा

एक दंपत्ति की शादी को साठ वर्ष हो चुके थे। उनकी आपसी समझ इतनी अच्छी थी कि इन साठ वर्षों में उनमें कभी झगड़ा तक नहीं हुआ। वे एक दूजे से कभी कुछ भी छिपाते नहीं थे। हां, पत्नी के पास उसके मायके से लाया हुआ एक डब्बा था जो उसने अपने पति के सामने कभी खोला नहीं था। उस डब्बे में क्या है वह नहीं जानता था। कभी उसने जानने की कोशिश भी की तो पत्नी ने यह कह कर टाल दिया कि सही समय आने पर बता दूंगी। 

आखिर एक दिन बुढ़िया बहुत बीमार हो गई और उसके बचने की आशा न रही। उसके पति को तभी खयाल आया कि उस डिब्बे का रहस्य जाना जाये। बुढ़िया बताने को राजी हो गई। पति ने जब उस डिब्बे को खोला तो उसमें हाथ से बुने हुये दो रूमाल और 50,000 रूपये निकले। उसने पत्नी से पूछा, यह सब क्या है। पत्नी ने बताया कि जब उसकी शादी हुई थी तो उसकी दादी मां ने उससे कहा था कि ससुराल में कभी किसी से झगड़ना नहीं । यदि कभी किसी पर क्रोध आये तो अपने हाथ से एक रूमाल बुनना और इस डिब्बे में रखना। 

बूढ़े की आंखों में यह सोचकर खुशी के मारे आंसू आ गये कि उसकी पत्नी को साठ वर्षों के लम्बे वैवाहिक जीवन के दौरान सिर्फ दो बार ही क्रोध आया था । उसे अपनी पत्नी पर सचमुच गर्व हुआ। 

खुद को संभाल कर उसने रूपयों के बारे में पूछा । इतनी बड़ी रकम तो उसने अपनी पत्नी को कभी दी ही नहीं थी, फिर ये कहां से आये? 

''रूपये! वे तो मैंने रूमाल बेच बेच कर इकठ्ठे किये हैं ।'' पत्नी ने मासूमियत से जवाब दिया।

Saturday, April 3, 2010

दीवानगी

दीवानगी मदहोश करके, दे गयी धोखा हमें,
क्या पता था इस कदर, तड़पायेगी वो अब हमें|
ये कहाँ मालूम था, कब उम्र यूँ ढल जायेगी,
ज़िन्दगी की वो सामां कब, बिन हवा बुझ जायेगी|
पर अँधेरा हो गया, अहले वफ़ा की रह में||
दीवानगी मदहोश करके...............
दर्द सीने में उठा पर, मर्ज़ तो कुछ था नहीं,
था कहाँ ज़र-अर्ज़ मैं, जीने का गुर समझा नहीं|
खो गया कब वो सलीका, ज़िन्दगी की चाह में||
दीवानगी मदहोश करके...............
ज़िन्दगी जब थी तो जिंदा, लाश बनकर रह गए,
जब नहीं स्वासें बचीं, तब दौड़ने का दम भरे|
खो गए अपने जो थे, गैरों के ज़िक्रे-आम में||
दीवानगी मदहोश करके................
है बड़ी खुदगर्ज़ दुनियां, कोई भी अपना नहीं,
नेक बन  करना भलाई, चाहतें  रखना नहीं|
ज़िन्दगी  सर हो रहेगी, काफ़िले-संसार में||
दीवानगी मदहोश करके..............

Wednesday, March 24, 2010

हे मानव

हे मानव तुम हो महान, मानवता को न भुला देना|
कोई दीन-दुखी मिल जाए अगर, उसका दुःख-दर्द बाँट लेना||
किसी पत्थर से ठोकर खाकर, खुद को ही तुम समझा लेना,
कोई और न ठोकर खाए कभी, ऐसा कर सको तो कर देना|
किसी आंख का आंसू पौंछ सको, यह नेक काम तुम कर लेना,
कोई कष्ट सहे तुम देख सको, ऐसा न कभी निष्ठुर बनना||
हे मानव तुम हो महान......................................................
जीवन में मुश्किल आती हैं, उनको हंसकर सह लेना,
है मानवता का धर्म यही, औरों से भी तुम कह देना|
यदि बाँट सको तो ग़म बाँटो, खुशियाँ औरों में लुटा देना,
कोई भला कहे या बुरा कहे, इसकी परवाह नहीं करना||
हे मानव तुम हो महान.....................................................
यदि मंदिर-मस्जिद जा न सको, रोते को कभी हंसा देना,
इससे बढ़कर कोई पुण्य नहीं, मौंका यदि मिले तो कर लेना|
आने वाली पीढ़ी को भी, ये उत्तम मार्ग दिखा देना,
यह फ़र्ज़ हमारा है प्रियवर, इसका विस्मरण नहीं करना||
हे मानव तुम हो महान...................................................
यदि फूल नहीं बन सकते तुम, तो काँटों से सह मत लेना,
यदि घाव नहीं भर सकते हो, तो उन्हें हरे मत कर देना|
मानव हो मानवता रखकर, हर प्राणी को तुम सुख देना,
कोई दानव तुमको नाम रखे, ऐसे दुष्कर्म नहीं करना||
हे मानव तुम हो महान.......................................
..............

Thursday, March 18, 2010

चाँद सा मुखड़ा

वह चाँद सा मुखड़ा लेकर के, खिड़की में खड़ी हो जाती है |
कोई देख ले उसको एक नज़र, झट से वो सहम सी जाती है || 
हर रोज शाम की बेला में, वह बाल संवारा करती है |
फिर चाँद से सुन्दर चहरे को, दर्पण में निहारा करती है ||
चहरे की दमक, नयनों की चमक, उसकी ये इशारा करती है |
सावन की घटायें देख-देख, तनहायी में आहें भरती है ||
किसी तेज हवा के झोंके से, सिहरन पैदा हो जाती है |
कोई देख ले उसको........................
.............||
एक रोज किसी असमंजस में, आँगन में उतरकर आती है |
सावन  की  मस्त  फुहारों  से,  साड़ी  गीली  हो  जाती  है ||
उसका गदराया यौवन फिर, आँचल में सिमट यूँ जाता है |
मदमस्त कोई पागल साया, जैसे आलिंगन करता है ||
उसकी यह हालत देख लगे, जैसे कोई आग जलाती है |
कोई देख ले उसको........................
.............||
एक रोज़ घटा घनघोर उठी, रिम-झिम रिम-झिम बरसात हुयी |
बिज़ली चमके, पानी बरसे, वह खड़ी खयालों में खोयी हुयी ||
सन-सन करती हुयी मस्त पवन, मानो उसको झकझोर गयी |
प्रियतम को देख बारजे में, वह दौड़ी उससे लिपट गयी |
मन में उसके जो आग लगी, मानो ठंडी हो जाती है|
कोई देख ले उसको..........................
..............|| 

Saturday, March 13, 2010

राजनीति

दहशतगर्दी छाई हुयी है आज देश में जमकर |
यूँ लगे ग़ुलामी जकड रही है फिर से हमको कसकर||
आज  देश  में  नेतागीरी,  भ्रष्टाचार  बनी  है |
जो जितना है भ्रष्ट, उसे उतनी वाह - वाह मिली है ||
मात्र-भूमि अपनी का सौदा करते शर्म नहीं है |
करें वतन से गद्दारी, उनका किरदार वही है ||
नेता का है काम देश, को लूट खाए जी भरकर |
यूँ लगे ग़ुलामी............................................||
झूँठ बोलना नेता की, पहली पहचान कही है |
लुच्चा, गुंडा, बेईमान, उनके सब नाम सही है ||
कैसे भी बस मिल जाए, सत्ता की चाह लगी है |
देश, धर्म और जन - सेवा की कुछ परवाह नहीं है ||
मानवता को भूल गए हैं, पाप करें जी भरकर |
यूँ लगे ग़ुलामी........................................||
जाति-धर्म और प्रांत-वाद की राजनीति जननी है |
नभ और धरा सामान भिन्न, इसकी कथनी करनी है ||
लूट-पात, दंगे-फसाद सब-कुछ इनको बरनी है |
इतने सबके बिना सुनो नहीं राजनीति चलनी है ||
संसद कर दें ठप्प, आज हंगामा हो जी भरकर |
यूँ लगे ग़ुलामी...........................................||

Sunday, February 28, 2010

होली आई !

होली आई खुशियाँ लाई,
प्यार से सबको गले लगाना |
हटा बैर की क़ातिल छाया,
प्रेम के रंग में तुम रंग जाना|
राग - द्वेष के मैलेपन को,
होली के संग दहन कराना|
प्रेमपूर्ण माहौल बनाकर,
सबके दिल में प्यार जगाना|
कही - सुनी बातों को लेकर,
जाति - धर्म में खो मत जाना|
हिन्दू, मुश्लिम, सिख, ईसाई,
सबको प्रेम के रंग लगाना|
बहुत हुआ आतंक देश में,
"माँ होली" से करो याचना|
दुर्जन, दुष्ट साथ ले जाओ,
सिर्फ प्यार हर दिल में रखना|
मेरा सबसे नम्र निवेदन,
क्रोध - शोध को सदा त्यागना|
जाति - धर्म - भाषा की अग्नि,
होली में अर्पण कर देना|
सिर्फ प्यार से हर मानव के,
दिल को, दिल से रंग लगाना|
बैर-भाव होली में रखकर,
भारत को उत्कृष्ट बनाना|

Tuesday, February 23, 2010

"हकीक़त"

मैं क्या हूँ, कहाँ मेरी
क्या है जरूरत,
यही सोचने में
लगा हूँ अभी तक.
हूँ पापा का बेटा,
या मैय्या का छैया.
बच्चों का पालक,
या पत्नी का पिया.
भाई का भैया,
या बहना का वीरा.
नहीं मैं समझ इसको,
पाया अभी तक. मैं क्या हूँ.....
मैं निकला जो घर से,
मिले मीत मन के.
लगा जैसे मेरी ही,
सबको है चाहत.
समझ में नहीं,
आ रही थी ये दुनियां.
चले साथ मेरे,
वो खुदगर्ज तब तक. मैं क्या हूँ......
मगर ज्यों ही जीवन,
समझने लगा मैं.
मेरे साए ने भी,
मेरा साथ छोड़ा.
जवानी ने जो कुछ,
कराया तमाशा.
मुझे याद है शब्दशः
वो अभी तक. मैं क्या हूँ.....
ढली उम्र रिश्ते,
सुलझने लगे हैं.
ज़माने में सब रंग,
बदलने लगे हैं.
बिना शब्द हम भी,
समझने लगे हैं.
नहीं आज अपनी,
किसी को जरूरत. मैं क्या हूँ.....
हुयी देह जर्ज़र,
न अब काम होता.
न आदेश की,
कोई तामील होती.
मैं कहता हूँ कोई,
माने न माने.
ज़माने में सबकी,
यही है "हकीक़त". मैं क्या हूँ.......

Wednesday, February 17, 2010

गुरु-महिमा

गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो, जीना हैं किस काम का.
जीवन को विषयों में गंवाया, क्यों सोचे उस धाम का.
रूपवान, सत्कीर्तिवान, धनवान हुआ तो क्या पाया?
सुन्दर पत्नी,धन-दौलत,घर,पुत्र-पौत्र में है खोया,
गुरु चरणों में ध्यान लगा ले, हटे मोह संसार का.
गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो................................1
वेद पढ़े, शत-शास्त्र पढ़े पर, गुरु की शरण कभी न गया,
तीरथ सारे किये मगर, मन-मंदिर का दर्शन न किया,
गुरु चरणों का सेवक बन, तो खुले द्वार प्रभु-धाम का.
 
गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो..................................2
देश-विदेशों में घूमा, राजा - महाराजा कहलाया,
सदाचार भरपूर किया पर, गुरु - प्रसाद नहीं पाया,
गुरु कृपा को समझ रे बन्दे, सेवक बन गुरु-पाद का.

 गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो...............................3
सुख-ऐश्वर्यों में रहा सदा और, दान-पुण्य भी खूब किया,
गुरु कृपा द्रष्टि भी मिली पर, गुरु चरणों से दूर रहा,
समय है अब भी जाग रे प्राणी, याचक बन गुरु प्रेम का.
 
गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो.................................4
मन, भोग-योग-धन-सत्ता से, तेरा विचलित एक पल न हुआ,
हर पल सयंम से अटल रहा, पर गुरु चरणों को भूल गया,
ऐसा संयम और अटलता, फिर तेरे किस काम का.

गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो........................................5
मन, धन-भवन-, रूप-योवन, और माया में आसक्त नहीं,
भोग और विषयों से दूर, गुरु चरणों में आसक्ति नहीं,
ऐसा त्याग और निष्ठा फिर, नहीं रहे कुछ काम का.
गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो....................................6
राजा हो या रंक अगर मन, गुरु चरणों में रमा रहे,
पुण्य करे, सतसंग करे और, गुरु चरणों के पास रहे,
गुरु आज्ञा का पालन करले, दर्शन हो घनश्याम का.

गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो.....................................7
ज्ञानी विद्वान् हो कितना भी, गुरु बिन भाव पार नहीं होता,
जनम-जनम दुनियां माया में, भटक-भटक रोता रहता,
राम, कृष्ण के जैसा तू भी, सेवक बन गुरु देव का.
गुरु चरणों से प्रीति नहीं तो......................................8

Friday, February 12, 2010

बच्चे हैं नादान

बच्चे हैं नादान, मगर हम भारत की पहचान बनेंगे|
पढ़-लिखकर विद्वान बनें हम, रोशन इसका नाम करेंगे||


मात-पिता और गुरुजनों के, लाड-प्यार का पात्र बनेंगे|

चमके उनका नाम जगत में, ऐसे हम संकल्प करेंगे||


भगत सिंह, आज़ाद, राजगुरु, जैसे हम इंसान बनेंगे|

दुश्मन डर से थर-थर काँपे, ऐसे हम सब काम करेंगे||


वीर शिवाजी से शिक्षा ले, देश-धर्म की ढाल बनेंगे|

भारत-माता की रक्षा में, तन-मन-धन बलिदान करेंगे||


हो करके विज्ञान-विशारद, ऐसे हम विद्वान् बनेंगे|

दुनियां जिस पर नत-मस्तक हो, ऐसे आविष्कार करेंगे||


हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई, के हम अनुचर नहीं बनेंगे|

आपस में मिल-जुलकर हम सब, नए युग का निर्माण करेंगे||


जन-सेवा अनवरत करें हम, फल के इक्षुक नहीं बनेंगे|

मेहनत, लगन और निष्ठा से, अपना बस कर्त्तव्य करें
गे|

भारत के नौनिहालों को समर्पित"

Saturday, January 23, 2010

ग़ज़ल

वो चुल-बुली सी, नाज़ुक कली सी,
मिली थी कभी, इस फिजां में।
नया नाम लेकर, वो चेहरा बदलकर,
खिली आज फिर, गुल्शितां में॥
रखा था जिसे हमने, दिल में छुपाकर,
यादों की महफ़िल, में यूँ सजाकर।

सोचा नहीं था, कभी हम बिछुड़कर,

मिल जायेंगे यूँ, कहीं पास आकर।

मगर मिल गए हम, वही प्यास लेकर,

छोटे से इस जहाँ में...नया नाम.......
गुज़रा कभी जब, तेरे पास से तो,
कहा तूने कुछ, यूँ लगा।
तेरे होंठ चुप थे, फिर भी हमें क्यों,
बहुत कुछ सुना, यूँ लगा।
शायद दिलों ने, एक दूसरे को।
दी आवाज अपनी जुबां में...नया नाम....
जब दूर था तो, बहुत कहना चाहा,
नज़दीक आकर, न कुछ बोल पाया।
कहाँ से शुरू करके, क्या-क्या कहूँ मैं,
कुछ भी तो मेरी, समझ में न आया।
कहना तो चाहा, मगर कह न पाया,
मेरे दिल की वो दास्ताँ मैं...नया नाम...
बहुत कुछ था कहना, बहुत कुछ था सुनना,
मिली एक दिन फिर, हमें वो हसीना।
लगे बात करने, तभी टूटा सपना,
बीवी को देखा, तो आया पसीना।
मेरे दिल की हालत, तो नाजुक थी इतनी,

कुछ कर ही न पाया बयां मैं...नया नाम.....

बस यही सोचता रहता हूँ

इस देश की हालत देख आज,मैं हैरत मैं पड़ जाता हूँ |
जाने क्यों हम सब चुप है अभी,बस यही सोचता रहता हूँ||
जो जितना भ्रष्ट कुटिल पापी,उतना ही आदर पाता है|
सच के मार्ग पर चलता जो, वह पेट नही भर पाता है||
क्यों झूठ के सिर पर रखा ताज, यह कोई नही बतलाता है|
क्यों सत्य हुआ बे-ताज आज,बस यही सोचता रहता हूँ|। 

इस देश की हालत.............................................|||। 

कम कपड़ो में भारत की नारी,हीरोइन समझी जाती है |
जो सर पर आँचल ओढ़ चले,पिछडी कहलाई जाती है||
क्यों परम्परा दी छोड़ आज,ये बात समझ नही आती है|
क्या कपड़े का टोटा है यहाँ,बस यही सोचता रहता हूँ||
 
इस देश की हालत...........................................||2||

जो भ्रष्ट और हत्यारा है,संसद पहुँचाया जाता है|
क्यों सत्पथ के अनुयायी को,यहाँ टिकट नहीं मिल पाता है||
नेता अपने वादों से यहाँ,हर बार मुकरता जाता है|
फ़िर क्यों हम उसकी बात सुनें ,बस यही सोचता रहता हूँ ||
इस देश की हालत..............................................|||| 


जहाँ दूध की नदियाँ बहती थी,वह भारत देश हमारा है|
फ़िर पेप्सी-कोला को हमने, क्यों खुश होकर स्वीकारा है||
क्यों दूध के बदले बच्चों को, पेप्सी का दिया सहारा है|
क्या हमको इससे मिला आज, बस यही सोचता रहता हूँ||
इस देश की हालत.............................................||
|| 


अंग्रेजी के स्कूलों ने बच्चों के,बदले हैं मिजाज| फ़िर
गुरुकुल शिक्षा का रिवाज ,बिल्कुल गायब क्यों हुआ आज||
अंग्रेजी तो अंग्रेजों की,फ़िर क्यों हम इस पर करें नाज़ |
क्या पहले से खुशहाली है,बस यही सोचता रहता हूँ||
इस देश की हालत...........................................||
||
 

इस देश दशा को देख-देख,हर पल खोया सा रहता हूँ | 
जब वक्त नही कटता मेरा,बस कविता लिखता रहता हूँ||
दुनिया की दलीलें सुन-सुन कर,कुछ बोल नहीं दे पाता हूँ|
कविता मेरी कह दे कोई,बस यही सोचता रहता हूँ||
इस देश की हालत...........................................||||