Friday, April 30, 2010

भारत माता

भारत माता है मेरी इसके लिए मैं,
सर कटाकर भी सदा लड़ता रहूँगा|
"मैं" नहीं तो क्या हुआ वो तो रहेगा,
सांस भी जिसने अभी तक ली नहीं है|
पर यूँ ही तुमसे ग़दर का हर जनम,
हर घडी आवाहन मैं करता रहूँगा||
तुम वो दानव हो जिसे अपने न उसके,
माँ - बहन - बच्चे - बड़े दिखते नहीं हैं|
इसलिए तो रौंदकर निर्दोष जानें,
कह रहे हो मजहवी जेहाद है ये|
पर निकम्मों ध्यान से सुन लो जरा,
"मैं" हर जनम इस ज़ुल्म से लड़ता रहूँगा||
क्या छल - कपट - धोखा तेरा ईमान है,
क्या बम - धमाके - आग तेरी शान है?
है दम तो आकर सामने दिखला ज़रा,
इंसानियत तुझको खड़ी ललकारती है|
है  भरी  तेरे  जिगर  में  आग  जो,
उस आग को अपने लहू से रोक दूंगा||
हैं  तेरे  ना-पाक  दिल  में  जो  इरादे,
वो  कभी  पूरे  न  होंगे  ज़ुल्म-जादे|
इंसानियत में घोलता है क्यों ज़हर?
नामो-निशां मिट जायेगा कुछ कर फ़िकर|
आजा शरण में आज भी होगी महर,
वर्ना उठा खंज़र ज़िगर में घोप दूंगा||

Monday, April 5, 2010

मायके का डब्बा

एक दंपत्ति की शादी को साठ वर्ष हो चुके थे। उनकी आपसी समझ इतनी अच्छी थी कि इन साठ वर्षों में उनमें कभी झगड़ा तक नहीं हुआ। वे एक दूजे से कभी कुछ भी छिपाते नहीं थे। हां, पत्नी के पास उसके मायके से लाया हुआ एक डब्बा था जो उसने अपने पति के सामने कभी खोला नहीं था। उस डब्बे में क्या है वह नहीं जानता था। कभी उसने जानने की कोशिश भी की तो पत्नी ने यह कह कर टाल दिया कि सही समय आने पर बता दूंगी। 

आखिर एक दिन बुढ़िया बहुत बीमार हो गई और उसके बचने की आशा न रही। उसके पति को तभी खयाल आया कि उस डिब्बे का रहस्य जाना जाये। बुढ़िया बताने को राजी हो गई। पति ने जब उस डिब्बे को खोला तो उसमें हाथ से बुने हुये दो रूमाल और 50,000 रूपये निकले। उसने पत्नी से पूछा, यह सब क्या है। पत्नी ने बताया कि जब उसकी शादी हुई थी तो उसकी दादी मां ने उससे कहा था कि ससुराल में कभी किसी से झगड़ना नहीं । यदि कभी किसी पर क्रोध आये तो अपने हाथ से एक रूमाल बुनना और इस डिब्बे में रखना। 

बूढ़े की आंखों में यह सोचकर खुशी के मारे आंसू आ गये कि उसकी पत्नी को साठ वर्षों के लम्बे वैवाहिक जीवन के दौरान सिर्फ दो बार ही क्रोध आया था । उसे अपनी पत्नी पर सचमुच गर्व हुआ। 

खुद को संभाल कर उसने रूपयों के बारे में पूछा । इतनी बड़ी रकम तो उसने अपनी पत्नी को कभी दी ही नहीं थी, फिर ये कहां से आये? 

''रूपये! वे तो मैंने रूमाल बेच बेच कर इकठ्ठे किये हैं ।'' पत्नी ने मासूमियत से जवाब दिया।

Saturday, April 3, 2010

दीवानगी

दीवानगी मदहोश करके, दे गयी धोखा हमें,
क्या पता था इस कदर, तड़पायेगी वो अब हमें|
ये कहाँ मालूम था, कब उम्र यूँ ढल जायेगी,
ज़िन्दगी की वो सामां कब, बिन हवा बुझ जायेगी|
पर अँधेरा हो गया, अहले वफ़ा की रह में||
दीवानगी मदहोश करके...............
दर्द सीने में उठा पर, मर्ज़ तो कुछ था नहीं,
था कहाँ ज़र-अर्ज़ मैं, जीने का गुर समझा नहीं|
खो गया कब वो सलीका, ज़िन्दगी की चाह में||
दीवानगी मदहोश करके...............
ज़िन्दगी जब थी तो जिंदा, लाश बनकर रह गए,
जब नहीं स्वासें बचीं, तब दौड़ने का दम भरे|
खो गए अपने जो थे, गैरों के ज़िक्रे-आम में||
दीवानगी मदहोश करके................
है बड़ी खुदगर्ज़ दुनियां, कोई भी अपना नहीं,
नेक बन  करना भलाई, चाहतें  रखना नहीं|
ज़िन्दगी  सर हो रहेगी, काफ़िले-संसार में||
दीवानगी मदहोश करके..............