Monday, November 15, 2010

भूत और नेता

भूतों का दल पहुँच गया नेताजी के द्वार|
नेता जी सो रहे थे बे-सुध पाँव पसार||
एक ने कहा ले चलो इसे "भूत-संसार"|
देखें इसका असर क्या होता हमपर यार||
तुरत दुसरे ने कहा ये तो है ग़द्दार|
इसको अपने लोक में ले जाना बेकार||
यह सुनकर कहने लगा भूतों का सरदार|
अगर जगा तो करेगा तुम पर अत्याचार||
यहीं बूथ लुट्वायेगा कर देगा बेकार|
आस्तीन का सांप है ना करना ऐतबार||
इंसानी गलती करो नहीं तुम्हें अधिकार|
नेता पर विस्वास कर नहीं मिले कुछ सार||
इसको ले जाना नहीं छोडो यहीं विचार|
और कहीं पर ढूंढते अपना नया शिकार||

Sunday, November 14, 2010

लहर का खेल रहता है

लहर का खेल रहता है, किनारे टूट जाते हैं,
समय करवट बदलता है, सहारे छूट जाते हैं|
 

अनोखी चीज़ है होनी, न कोई जोर चलता है,
न जाने वक्त का रुख किस घडी, किस ओर होता है|
 

अचानक आसमाँ का रँग, बादल लूट लेते हैं,
नज़र प्यासी भटकती है, नज़ारे रूंठ जाते हैं|
 

अचानक मिल गया कोई, कि मंजिल मिल गयी जैसे,
अचानक चल दिया कोई, कि जैसे प्राण तन में से|
 
न जाने कौन सा रिश्ता, नज़र से जन्म लेता है,
कि अनजानी निगाहों के इशारे, लूट जाते हैं|
 

शिकायत भी करें किस से, किसे ठहराएँ हम दोषी,
अगर उँगली उठाएंगे, तो खुद बन जायेंगे दोषी|
 

न जाने हुक्म किसका है, सभी चुप मान लेते हैं,
 कि दुश्मन बनके हमको ह़ी, हमारे लूट जाते हैं|