Sunday, September 13, 2015

हे ईश्वर !

क्यों हमको वो याद हमेशा आते हैं,
क्यों ख़्वाबों में आकर के तड़पाते हैं?
कैसा है ये बंधन कैसा आलम है,
जाना चाहूँ दूर पास क्यों लाते हो?
किस्मत के लेखों ने कैसा खेल किया,
जहां नहीं थी चाह वहाँ क्यों मेल किया?
कैसे अब सच को ही पीछे छोड़ चलूँ,
हे ईश्वर क्यों राह नहीं दिखलाते हो?
जिसपर है अधिकार किसी अनजाने का,
उसके ख्वाब मेरे मन में क्यों आते हैं?
बंधन है या क़र्ज़ पुराने जन्मों का,
क्यों इसका आभाष नहीं करवाते हो?
हैं दुनियां में पाप अगर ऐसे रिश्ते,
क्यों उनकी आधार शिला रख जाते हो?
माँटी के पुतलों को तुम जीवन देकर,
पत्थर के भगवान नज़र क्यों आते हो?
आज कसम है तुमको मेरे कर्मो की,
क्यों अन्धकार में ज्योति नहीं बन जाते हो?
कैसे इस जीवन को मैं संपन्न करूँ,
क्यों मार्ग मुक्ति का मुझे नहीं दिखलाते हो?