Sunday, November 29, 2015

छोड़ नहीं सकते..!

छोड़ नहीं सकते क्या अब हम,
जाति धर्म की बातें करना।
बर्बरता को संस्कृति कहकर
,
निर्दोषों का रक्त बहाना।।
जाति धर्म वर्णों की खातिर,
मानवता को घायल करना।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
,
बनकर जग में विष फैलाना।।
देश राष्ट्र राज्यों के होकर,
धरा-धर्म को दूषित करना।
भारत पाक चीन अमरीका
,
इंग्लिश रूसी क्यों कहलाना।।
नदी नीर, वसुधा उसका धन,
कभी न कहती किसको देना।
छोड़ नहीं सकते क्या हम भी
,
प्रकृति को अंकुश दिखलाना।।
देह द्वेष और काम क्लेश का,
द्वन्द्व दिलों में क्यों फैलाना।
नारी रहे पुरुष की दासी
,
क्यों विचार यह दिल में लाना।
धरती यदि हम सबकी माता,
क्यों न बंधु भाव से रहना।
रोक नहीं सकते क्या अब हम
,
दुनियाँ में नफरत फैलाना।।
-अशोक शर्मा

Monday, November 16, 2015

बचपन

सुबह सवेरे जल्दी उठकर
मात-पिता का वंदन करना।
नित्य क्रिया से निवृत होकर
स्वास्थ्य हेतु कुछ कसरत करना।
बहुत याद आते हैं वो दिन
निश्छल मन ईश्वर को जपना।
साफ़ स्वच्छ तन-वस्त्र पहनकर
माँ के प्रेमाशीष का मिलना।
विद्यालय की राह में मिलते
सभी बड़ों का आदर करना।
गुरु की सीख पिता का कहना
माँ का आँचल ही था गहना।
गलती करके डरे सहमते
माँ को सब कुछ सत्य बताना।
मात्र-प्रेम पाकर अबोध मन
सुबक सुबक कोने में रोना।
झूंठ बोलना पाप समझकर
सदा सत्य की बातें करना।
खूब लगाकर मन पढ़ने में
निडर - प्रखर - साहस से रहना।
याद बहुत आता है बचपन
कैसा था वह स्वप्न सलौना।
माँ की ममता और प्रेम से
संवर गया था जीवन अपना।

Friday, November 13, 2015

रहें पुष्प खिले गुलशन महके

सुख मिले सदा खुशियाँ बरसें,
ऐसी हों जीवन की घड़ियाँ।
रहें पुष्प खिले गुलशन महके,
गुलज़ार रहे अपनी दुनियाँ।।
जीवन का सार समय देकर,
इस रेल को सींचा है तुमने।
पत्नी - बच्चों माँ - बापू का,
कई बार हृदय तोड़ा तुमने।
पर रेल चले और देश बढे,
इस राह ना आने दी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------

जीवन भर अच्छे काम किये,
परहित को धर्म समझ तुमने।
कभी पुष्प मिले कभी खार मिले,
पर राह नहीं छोड़ी तुमने।
निज़ आदर्शों को ढाल बना,
कर लीं वश में सबकी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------
अब सेवा निवृत होकर तुम,
आज़ाद आज हो जाओगे।
जीवन के क्षण-क्षण की खुशिया,
अपनों को अब दे पाओगे।
बहने दो जीवन में अविरल,
खुशियों के अमृत की नदियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------

सौ वर्ष जिओ चिर-स्वस्थ रहो,
है ईश्वर से इतना कहना।
हम सबके सर पर भी अपना,
आशीष बनाये तुम रखना।
ऐहसास न हो कभी जीवन में,
हैं अपनी अलग अलग दुनियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------
हम सब मिलकर के आज तुम्हें,
स-हर्ष विदा कर देते हैं।
खुशियों से भरी विरासत को,
सींचेंगे वादा करते हैं।
इस प्रेम आल्हादित मौके पर,
मत आँख से बहने दो दरिया।।
रहे पुष्प खिले-----------------

रहें पुष्प खिले गुलशन महके

सुख मिले सदा खुशियाँ बरसें,
ऐसी हों जीवन की घड़ियाँ।
रहें पुष्प खिले गुलशन महके,
गुलज़ार रहे अपनी दुनियाँ।।
जीवन का सार समय देकर,
इस रेल को सींचा है तुमने।
पत्नी - बच्चों माँ - बापू का,
कई बार हृदय तोड़ा तुमने।
पर रेल चले और देश बढे,
इस राह ना आने दी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------

जीवन भर अच्छे काम किये,
परहित को धर्म समझ तुमने।
कभी पुष्प मिले कभी खार मिले,
पर राह नहीं छोड़ी तुमने। 
निज़ आदर्शों को ढाल बना,
कर लीं वश में सबकी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------
अब सेवा निवृत होकर तुम,
आज़ाद आज हो जाओगे।
जीवन के क्षण-क्षण की खुशिया,
अपनों को अब दे पाओगे।
बहने दो जीवन में अविरल,
खुशियों के अमृत की नदियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------

सौ वर्ष जिओ चिर-स्वस्थ रहो,
है ईश्वर से इतना कहना। 
हम सबके सर पर भी अपना,
आशीष बनाये तुम रखना। 
ऐहसास न हो कभी जीवन में,
हैं अपनी अलग अलग दुनियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------
हम सब मिलकर के आज तुम्हें,
स-हर्ष विदा कर देते हैं।
खुशियों से भरी विरासत को,
सींचेंगे वादा करते हैं।
इस प्रेम आल्हादित मौके पर,
मत आँख से बहने दो दरिया।।
रहे पुष्प खिले-----------------

Thursday, November 12, 2015

एक दिया

एक दिया हो ज्ञान रूप
मन मंदिर को रोशन कर दे।

एक दिया हो सघन साधना
साधु सदृश जीवन कर दे।।

एक दिया सुन्दर इतना हो
जग-उपवन जगमग कर दे।

एक दिया हो प्रेम रूप
जन-जीवन प्रेमपूर्ण कर दे।।

एक दिया जो याद मिटाये
नफरत को ओझल कर दे।

एक दिया हो मदद रूप
दुर्बल मन में ताकत भर दे।।

एक दिया सीमा पर खप गये
वीरों को अर्पण कर दे।

एक दिया उस आशा का
दुनियाँ के क्लेश शांत कर दे।।

एक दिया हिम्मत वाला
मन का विश्वास प्रबल कर दे।

एक दिया भूली बिसरी
अच्छी यादें ताज़ा कर दे।।

एक दिया दुनियाँ से तिमिर का
जड़ सह सर्वनाश कर दे।

एक दिया उज्जवल अखंड
भारत की सेवा का गुण दे।।

एक दिया इस 'दीपोत्सव'
मेरे संकल्प अटल कर दे।

सत्कर्मों की राह चलूँ
मन में इतना साहस भर दे।

Wednesday, November 11, 2015

दीपों का यह पर्व 'दिवाली'

अन्धकार मिट जाए धरा से
सत्य सदा रोशन ही रहे।
हर तन पर हों वस्त्र
सभी के सर पर छत की छाँव रहे।।
भूख सताये नहीं किसी को
धरणि धान्य-धन पूर्ण रहे।
मिले सभी को काम
किसी का नहीं कोई मोंहताज़ रहे।।

कम मिलने पर दुःख न हो
ज्यादा का नहीं अभिमान रहे।
हर प्रलय आपदा विपदा में
मानव मानव के साथ रहे।।
द्वेष राग और भेद न हो
बस भाई-चारा बना रहे।
आशा का दीपक सदा जले
दिल में उमंग की लहर रहे।।

हो जीवन उत्कृष्ट सभी का
हर्ष दिलों में बसा रहे।
दीपों का यह पर्व 'दिवाली'
सबके लिए शुभ सौम्य रहे।।

Thursday, November 5, 2015

जन - जीवन

चेहरों पर भाव मोहब्बत के,
दिल में नफरत छल-कपट भरा।
हर कदम कदम बस धोखे हैं,
रिश्तों के रक्त रंगी ये धरा।।

हर दिन खबरों का मेला है,
कोई यहाँ लुटा कोई वहां मरा।
पर सच तो है मानवता की,

नहीं फिक्र किसी को रही ज़रा।।
हो रही कलंकित मर्यादा,
हर रिश्ता है कतरा कतरा।
क्या अपने सर यह दोष नहीं,
दुनियाँ में आकर कुछ न करा।।

हर पल मैं - मेरा कर कर के,
अपने ही जीवन रंग भरा,
आने वाली पीढ़ी के लिए,
 

नहीं रंज-फिक्र मन में उतरा।।
यदि चाहो अब सुधरे समाज,
दिल से कर लो सहयोग ज़रा।
रिश्तों में घोर मलिनता है,
युग आये आदर प्यार भरा।।

सब छोड़ें अहम् भावना को,
हो जाति - धर्म से दूर ज़रा।
सबका जीवन सुखमय गुज़रे,
भयमुक्त रहे जन जीव धरा।।