मैं क्या हूँ, कहाँ मेरी
क्या है जरूरत,
यही सोचने में
लगा हूँ अभी तक.
हूँ पापा का बेटा,
या मैय्या का छैया.
बच्चों का पालक,
या पत्नी का पिया.
भाई का भैया,
या बहना का वीरा.
नहीं मैं समझ इसको,
पाया अभी तक. मैं क्या हूँ.....
मैं निकला जो घर से,
मिले मीत मन के.
लगा जैसे मेरी ही,
सबको है चाहत.
समझ में नहीं,
आ रही थी ये दुनियां.
चले साथ मेरे,
वो खुदगर्ज तब तक. मैं क्या हूँ......
मगर ज्यों ही जीवन,
समझने लगा मैं.
मेरे साए ने भी,
मेरा साथ छोड़ा.
जवानी ने जो कुछ,
कराया तमाशा.
मुझे याद है शब्दशः
वो अभी तक. मैं क्या हूँ.....
ढली उम्र रिश्ते,
सुलझने लगे हैं.
ज़माने में सब रंग,
बदलने लगे हैं.
बिना शब्द हम भी,
समझने लगे हैं.
नहीं आज अपनी,
किसी को जरूरत. मैं क्या हूँ.....
हुयी देह जर्ज़र,
न अब काम होता.
न आदेश की,
कोई तामील होती.
मैं कहता हूँ कोई,
माने न माने.
ज़माने में सबकी,
यही है "हकीक़त". मैं क्या हूँ.......
Tuesday, February 23, 2010
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