Wednesday, January 9, 2013

मन की व्यथा

कैसे कहूँ मन की व्यथा, जज्वा दफ़न सा हो गया,
आज फिर मन से मेरे, शब्दों का दरिया बह गया।
माँ  की आँखों में हैं आंसू, मेरा मन भी रो रहा,
बाप के मन का वो डर, फिर से प्रबल सा हो गया।।


भाई का सिर भी झुक गया, मानो शरम के बोझ से,
बहना की सुनकर चीख, उसका भी कलेजा फट गया।
भगवान् भी शरमा गया, अपने ही आविष्कार से,
कमज़र्फ जिंदा घूमते, यमराज
मानो डर गया।।

इंशान ज्यों ज्यों बढ़ रहे, इंशानियत कम हो गयी,
भारत की अपनी संस्कृति, दिन-दिन ख़तम सी हो रही।
इस कदर दिल भर गया, प्रतिदिन के अत्याचार से,
ज़िन्दगी मुश्किल ही थी, मरना भी मुश्किल हो गया।।

Friday, January 4, 2013

बापू तेरे देश की हालत

गली-गली में आन्दोलन और,
जन - जन में आक्रोश है।
बापू तेरे देश की हालत,

फिर  से  डांवा - डोल  है।।

भ्रष्टाचार चरम सीमा पर,
पाप  बढ़ा  घनघोर  है।
धर्म  की कोई बात न करता,

अधरम का ही जोर है।।
 

रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
रखवाला ही  चोर  है।
पैसों से कानून बिक रहा,

बात  बड़ी  दिल-तोड़  है।।
 

मानव की तो हुयी तरक्की,
मानवता  कमजोर  है।
ताकत से चल रही विरासत,

प्यार  को  नहीं  ठौर  है।।
 

ज्यों-ज्यों कदम बढे कलयुग के,
जीवन  हुआ  कठोर  है।
माँ बहनों की घर के बाहर,

लाज़ लुटे हर ओर  है।

किस से कहूँ ह्रदय की पीड़ा,
कोई  न  देता  गौर  है।
सुबक-सुबक कर दिल है रोता,

विह्वल  भाव - विभोर  है।।

Thursday, January 3, 2013

नया वर्ष

नया वर्ष सुखमय हो सबको,
जन-जीवन उत्कर्ष भरा हो।
गरिमा, गौरव और प्रतिष्ठा,
गगन चूमते शिखर सद्रश हो।

पुरुषारथ - उत्साह - पराक्रम,
पर्वत के सम अचल-अडिग हो।
दुःख, शंका और गम हर मन से,
कोसों दूर नदारद - सम  हो।

हमले - दंगे - दुष्कर्मों के,
डर से मुक्त हर-एक जन-मन हो।
करुणा - दया - मदद के सुर से,
ओत - प्रोत हर-एक जीवन हो।

खुशहाली उन्नति और प्रगति,
सदा शिखर की ही मल्लिका हो।
ऐसा सुखमय और आनंदित,
हम सबका जीवन प्रति-क्षण हो।

Sunday, November 11, 2012

दिवाली

लुप्त हो गयी है जो दुनिया के पटल से,
वही इंसानियत एक बार फिर जगाई जाये।


खुशियों की इन दीपमालाओं में,

एक लौ इंसानियत की भी जलाई जाये।


जला दो फुलझड़ी से नफरतों को यारो,
कि प्यार ही प्यार बस नज़र आये,


शरहदों को सजा दो मुहब्बत के चिरागों से ,

उस तरफ हो अमन इस तरफ भी बहार आये।


आइये दिवाली कुछ इस तरह से मनाई जाये,

फिर से हो 'राम-राज' हर दिल से दुआ की जाये।

Wednesday, November 7, 2012

"तुम्ही ने पुकारा"

न  देतीं  अगर  तेरी  यादें  सहारा,
खुदा जाने क्या हश्र होता हमारा।
रहा सोचता तेरे आँचल के नीचे,
बिगाड़ेंगे  तूफ़ान अब क्या हमारा।


मेरी राहें थीं जिससे रोशन हमेशा,
न जाने कहाँ खो गया वो सितारा।
तूफान  में  है  घिरी  मेरी  कश्ती,
नज़र भी नहीं आ रहा है किनारा।


कभी तुमने जिसको दिया था सहारा,
वही  आज  भी  हूँ  मगर  बे-सहारा।
बे-वफ़ा तुमको कहने की जुर्रत नहीं है,
मुकद्दर  ने  ही  साथ  छोड़ा  हमारा।

Monday, March 19, 2012

तिरंगा

 तीन  रंग  से  बना  तिरंगा, अविरल  लहरायेगा |
दुनिया का कोई दुश्मन ना, इसको छू भी पायेगा ||
मेरे देश की शान तिरंगा, हर दिल में बसा रहेगा |
स्वाभिमान की भाषा यह, दुनियां को सिखलायेगा ||
दुश्मन का दुस्साहस ना अब, यहाँ ठहर पायेगा |
भगत सिंह की वीर कथा, "आज़ाद" सदा गायेगा ||
खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी, ना ग़म का नाम रहेगा |
'हरा' रंग खुशहाली का, संगीत सदा गायेगा ||
'श्वेत' रंग शांति का द्योतक, यही संदेशा देगा |
रहो प्रेम से दुनिया में, ना हिंसा का डर होगा ||
'केसरिया' की वीर छटा से, हर दिल गद-गद होगा |
भारत  माँ  के  वीर  सपूतों,  से  ना  कोई  भिड़ेगा ||
हर बालक बन वीर शिवाजी, खड़ग हाथ में लेगा |
दुश्मन के ना-पाक इरादे, कुचल-कुचल रख देगा ||

Sunday, March 18, 2012

मैं रिटायर हो रहा हूँ

एक नयी सी ज़िन्दगी की राह पर,
अनजान सी पहचान लेकर चल पड़ा हूँ |
पहले सहमा कुछ मग़र अब,
स्वछन्द हूँ की मैं रिटायर हो रहा हूँ ||

आज तक दुनियां की भागम-भाग में,

ज़िन्दगी के गीत जो भूला हुआ था |
एक नयी धुन में सजाऊंगा उन्हें,
सोच करके में बहुत खुश हो रहा हूँ ||

पेढ़ पौधे फूल पंछी ये फिजायें औ नज़ारे,

ये समंदर आसमाँ ये झिलमिलाते चाँद तारे |
फिर नयी नज़रों से इनको देखकर,
साथ इनके ही मैं खुद को पा रहा हूँ ||

ज़िन्दगी की दौड़ में जब "अहम्" था,

जीत की ख्वाहिश में बस "हारा" रहा |
अब 'अहम्' को छोड़कर बस 'प्यार' है,
दिल की भोली ख्वाहिशों से मिल रहा हूँ ||

अनुभवों की ज़िन्दगी रिश्तों का मेला,

कर्मभूमि से "विदा" में ले रहा हूँ |
एस विरह-पल में तुम्हारे प्यार की आशा लिए,
आज फिर खुद में ही खुद को जी रहा हूँ ||

सब हैं जिसके और सब में जो समाया,

जिसकी माया ही निरंतर "प्राण"  है |
अब मिला है वक्त हाथों में जो कुछ,
खोज में उसकी स्वयं को पा रहा हूँ ||

आप सबका प्यार है सच्ची कमाई,

बाकी सब दो वक्त का खाजा रहा |
आज तक जो कह ना पाया था कभी,
आज वो सच्चे जिगर से कह रहा हूँ ||

कोहरे के मौसम

कोहरे का मौसम आया है, हर तरफ अंधेरा छाया है। मेरे प्यारे साथी-2, हॉर्न बजा, यदि दिखे नहीं तो, धीरे जा।। कभी घना धुंध छा जाता है, कुछ भी तुझे...