जन-जीवन उत्कर्ष भरा हो।
गरिमा, गौरव और प्रतिष्ठा,
गगन चूमते शिखर सद्रश हो।
पुरुषारथ - उत्साह - पराक्रम,
पर्वत के सम अचल-अडिग हो।
दुःख, शंका और गम हर मन से,
कोसों दूर नदारद - सम हो।
हमले - दंगे - दुष्कर्मों के,
डर से मुक्त हर-एक जन-मन हो।
करुणा - दया - मदद के सुर से,
ओत - प्रोत हर-एक जीवन हो।
खुशहाली उन्नति और प्रगति,
सदा शिखर की ही मल्लिका हो।
ऐसा सुखमय और आनंदित,
हम सबका जीवन प्रति-क्षण हो।
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