Saturday, March 23, 2013

जीवन का सच

मौत के हर कदम और करीब आ रहा हूँ,
मैं जीवन के सच से ही घबरा रहा रहा हूँ।

नहीं चाहिए ये ज़हाँ इसकी दौलत,
नहीं माँगता हूँ ज़माने की शौहरत।
मैं दुनियाँ के डर से सहम सा गया हूँ,
बिना ज़ल का दरिया मेरे सामने है।
उसी में कहीं डूबता जा रहा हूँ,
मौत के हर कदम…. .............।।

यहाँ कोई न अपना सभी हैं पराये,
वो झूँठे हैं रिश्ते जो हमने हैं पाए।
जो ऱब से था रिश्ता विसर सा गया हूँ,
जितना भी चाहूँ गले से लगाना।
मैं उतना ही और फासला पा रहा हूँ,
मौत के हर कदम…. ...............।।

क्या लाया था क्या साथ लेकर है जाना,
मिला जो भी जीवन का झूँठा बहाना।
मैं खुद झूँठ का खँडहर बन गया हूँ,
जब - जब ये सोचा चढ़ूँ सच की सीढ़ी।
उसी गर्त में फिर से गिरता रहा हूँ,
मौत के हर कदम…. .............।।

न मैया  न पापा  न भाई  न बहना,
न पत्नी  न बेटा  न बेटी का रहना।
रिश्तों की नुमाइस समझने लगा हूँ,
मगर मैं भी माया की दुनियाँ में खुद को।
कहीं  ढूँढने  का  यतन  कर रहा हूँ,
मौत के हर कदम…... ..........।।

Friday, March 22, 2013

सामाजिक दूरियाँ


मैंने सुना नारियों की लाज होती अंखियों में,
इसलिए शर्म से वो पलकें झुकाती थीं।
पतिव्रत धर्म आन बान शान रखने को,
गोरी परदे में अपने आप को छुपाती थी।
 
ऋषियों के देश भारत-वर्ष में ज़माने से वो,
गुरुकुल प्रथा की कैसी रीति निराली थी।
कन्याओं को शिक्षा देने कन्यां-पाठशालाओं में,
नारी शिक्षक उनको ऊंच-नीच समझाती थी।

 
बदला ज़माना सोच लोगों की बदलती गयी,
पश्चिम की सोच संस्कारों को निगलती गयी।
आगन में गूँजती आवाजें साझा कुटुम्बों की,
धीरे-धीरे कम हो बैड-रूम में सिमटती गयी।

 
खूब पढ़ते बच्चे उच्च शिक्षा का ज़माना लेकिन,
हाथ जोड़ झुकने की नियत ख़तम सी हुयी।
माता-पिता गुरुओं का आदर जैसे होता कभी,
प्रथा वो ज़माने से विलुप्त जैसे हो सी गयी।

 
प्रगति हुयी देश की पर सामाजिक दूरियों से,
रिश्तों के मोल के पतन को बचाना होगा

देश तो बढेगा लेकिन घर की ऐकता के लिए,
नैतिकता का पाठ नौ-निहालों को सिखाना होगा।


Tuesday, March 19, 2013

'मन का मीत'

पहली ही मुलाकात में वो मन में रह गया,
इंसानियत की सारी दास्तान कह गया।
मिलता रहा हूँ यूँ  तो हज़ारों से उम्र भर,
वो सख्स था जो दिल को दिलनशींन कर गया।

वाणी थी मधुर और चतुर सी जुबान थी,
चहरे पै दिल की बात कहती सी वो शान थी।
चुपचाप सा चेहरा मनो-गुलज़ार कर गया,
मैं भी अदा का उसकी कद्र दान हो गया।

कहते हैं बात करने को पहचान चाहिए,
वो खुद मुझे मिलकर नया अरमान दे गया।
फिर-फिर मिलूं मिलकर करूँ मिलने की आस फिर,
वो यूँ मिला मुझसे कि मेरा दिल ही ले गया।

मन ने कहा तुम भी चलो उसकी ही राह पर,
सच्चे बनो सादा रहो बस काम बन गया।
मन में सदा रखना महज़ मंगल की कामना,
बस मान लो हर सख्स 'मन का मीत' बन गया।
 
 
"मैं जब पहली बार बड़े भाई कविराज 'नमन' जी से मिला तो उनकी
मुलाकात से प्रेरित होकर लिखे शब्द आपके समक्ष प्रेषित हैं।"