Friday, March 22, 2013

सामाजिक दूरियाँ


मैंने सुना नारियों की लाज होती अंखियों में,
इसलिए शर्म से वो पलकें झुकाती थीं।
पतिव्रत धर्म आन बान शान रखने को,
गोरी परदे में अपने आप को छुपाती थी।
 
ऋषियों के देश भारत-वर्ष में ज़माने से वो,
गुरुकुल प्रथा की कैसी रीति निराली थी।
कन्याओं को शिक्षा देने कन्यां-पाठशालाओं में,
नारी शिक्षक उनको ऊंच-नीच समझाती थी।

 
बदला ज़माना सोच लोगों की बदलती गयी,
पश्चिम की सोच संस्कारों को निगलती गयी।
आगन में गूँजती आवाजें साझा कुटुम्बों की,
धीरे-धीरे कम हो बैड-रूम में सिमटती गयी।

 
खूब पढ़ते बच्चे उच्च शिक्षा का ज़माना लेकिन,
हाथ जोड़ झुकने की नियत ख़तम सी हुयी।
माता-पिता गुरुओं का आदर जैसे होता कभी,
प्रथा वो ज़माने से विलुप्त जैसे हो सी गयी।

 
प्रगति हुयी देश की पर सामाजिक दूरियों से,
रिश्तों के मोल के पतन को बचाना होगा

देश तो बढेगा लेकिन घर की ऐकता के लिए,
नैतिकता का पाठ नौ-निहालों को सिखाना होगा।


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