Sunday, November 11, 2012

दिवाली

लुप्त हो गयी है जो दुनिया के पटल से,
वही इंसानियत एक बार फिर जगाई जाये।


खुशियों की इन दीपमालाओं में,

एक लौ इंसानियत की भी जलाई जाये।


जला दो फुलझड़ी से नफरतों को यारो,
कि प्यार ही प्यार बस नज़र आये,


शरहदों को सजा दो मुहब्बत के चिरागों से ,

उस तरफ हो अमन इस तरफ भी बहार आये।


आइये दिवाली कुछ इस तरह से मनाई जाये,

फिर से हो 'राम-राज' हर दिल से दुआ की जाये।

Wednesday, November 7, 2012

"तुम्ही ने पुकारा"

न  देतीं  अगर  तेरी  यादें  सहारा,
खुदा जाने क्या हश्र होता हमारा।
रहा सोचता तेरे आँचल के नीचे,
बिगाड़ेंगे  तूफ़ान अब क्या हमारा।


मेरी राहें थीं जिससे रोशन हमेशा,
न जाने कहाँ खो गया वो सितारा।
तूफान  में  है  घिरी  मेरी  कश्ती,
नज़र भी नहीं आ रहा है किनारा।


कभी तुमने जिसको दिया था सहारा,
वही  आज  भी  हूँ  मगर  बे-सहारा।
बे-वफ़ा तुमको कहने की जुर्रत नहीं है,
मुकद्दर  ने  ही  साथ  छोड़ा  हमारा।