Sunday, March 12, 2017

आओ हे हरिकेश

रंग - बिरंगे रंग से, रंगा है पूरा देश,
जन मन में ना प्रेम है, सिर्फ भरा है क्लेश।
मैं - मेरी के अहम् से, सजा है मानव वेश,
हे हरि कैसा दे रहे, तुम जग को सन्देश।।
प्रेम - प्यार की कल्पना, सिर्फ रह गयी शेष,
जाति - धर्म की अग्नि में, मानव किया प्रवेश।
देश - द्रोह पर बोलते, देश - प्रेम से द्वेष,
भूल चुके अपना वतन, भाता दुश्मन देश।।
घर में बैरी गर्जते, दिल पर लगती ठेस,
दुश्मन के संग जो खड़े, खुद को कहें नरेश।
सेना के शत्रु बने, देशज व्यक्ति विशेष,
कर - दाता का धन हुआ, बेहद व्यर्थ निवेश।।
विप्र अवज्ञा बढ़ रही, भारत में अधिशेष,
दुर्जन मन ज़ाहिर हुआ, ब्रह्म विरोधी द्वेष।
विप्र - द्रोह विध्वंस हो, चिंतन करो विशेष,
ज्ञान परसु धारण करो, हे शृष्टिश्रेष्ठ सर्वेश।।
अग्नि देव को दीजिये, हे महादेव आदेश,
'दहन बुराई का करो, होली का धार वेश'।
रावण रूपी दंश का, अंत करो अवधेश,
कंस कुसाशन बढ़ गया, आओ हे हरिकेश।।

Monday, October 24, 2016

कर दो यह ऐलान

बचपन से जो देशभक्ति के गीत सुनाये जाते हैं,
वतन की रक्षा करने वाले धन्य कहाये जाते हैं।
आज मगर कुछ गद्दारों ने उन पर प्रश्न उठाये हैं,
देश धर्म की रक्षा में जिन अपने प्राण गंवाए हैं।

है उनको धिक्कार गीत जो देशद्रोह का गाते हैं,
भारत के जिस विद्यालय में विषधर पाले जाते हैं।
लोकतंत्र के हत्यारे बदनीयत दिल के काले हैं,
अपनी माँ का चीर हरण जो खुद ही करने वाले हैं।

वर्षों से जो वतन लूटते राजनीति के प्यादे हैं,
कर्कश स्वर से मन को विचलित करते जो नक्कारे हैं।
चीर फाड़ दो भारत से जो नमक हरामी करते हैं,
दुश्मन के आँगन में जिनके नाम से दीपक जलते हैं।

उनको कर दो दफन शब्द जो देशद्रोह का बोले हैं,
पापी पाक समर्थन में जो केवल ज़हर उगलते हैं।
सैक्यूलर के नाम से जो हिंदुत्व कुचलने वाले हैं,
आस्तीन में सरकारों ने जितने अजगर पाले हैं।

शंखनाद हो हिन्दुवाद का अगर देश के लाले हैं,
उन्हें दबा दो देश धर्म जो दूषित करने वाले हैं।
राजनीति के दंगल में इतिहास बदलने वाले हैं,
कर दो यह ऐलान देश को निर्मल करने वाले हैं।

Tuesday, October 18, 2016

जीवन उद्धार

वह जब से जीवन में आयीं,
तन मन मेरा चमन हो गया।
जीवन का यह कंटक वन अब,
गुल गुलशन गुलज़ार हो गया।।
चोटिल बोझिल से इस मन का,
उनसे मिल उपचार हो गया।
मन मरुथल का खाली घट अब,
मधुसागर संसार हो गया।।
मधुर मिलन की उस बेला से,
अब तक तय जो सफर हो गया।
सुंदर सुखद सुनहरे कल का,
हर सपना साकार हो गया।।
खट्टे मीठे अनुभव का कल,
नोंक झोंक से पार हो गया।
दुर्लभ दुर्गम दुःखद समय ही,
जीवन का आधार बन गया।
जनम जनम जीवन के पथ पर,
यदि उनसे हर मिलन हो गया।
मैं समझूँगा सफल हर जनम,
जीवन का उद्धार हो गया।।

Friday, March 25, 2016

समझ लेना कि होली है...!

भरा आनंद से हो मन,
समझ लेना कि होली है।
ह्रदय में हर्ष का नर्तन,
समझ लेना कि होली है।
इमारत एक पुरानी सी,
रुके बरसों के पानी सी।
लगे बीवी वही नूतन,
समझ लेना कि होली है।।
हर्ष से माँ पिता जी का,
ह्रदय गद गद कभी देखो।
ख़ुशी का तुम बनो कारण,
समझ लेना कि होली है।।
समझते हो अगर संतान के,
दायित्व का मतलब।
सफलतम कर सके पालन,
समझ लेना कि होली है।।
किसी इंसान को मुश्किल में,
उलझा देखते हो जब।
मदद करने को मचले मन,
समझ लेना कि होली है।।
हमारी जिन्दगी है यूँ तो एक,
दुःख का घना जंगल।
कभी आये ख़ुशी के क्षण,
समझ लेना कि होली है।।
अगर महसूस हो तुमको,
ख़ुशी गैरों की खुशियों में।
फिजां से दूर हो क्रंदन,
समझ लेना कि होली है।। स्वयं का घर भरा, खाया,
उड़ाया मौज करते हैं।
किसी भूखे को दे भोजन,
समझ लेना कि होली है।। घरों में रौशनी करके,
दिवाली सब मनाते हैं।
कभी रोशन हो अंतर्मन,
समझ लेना कि होली है।।

Monday, March 21, 2016

देशभक्ति


उन्हें यह फिक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ऐ-वफ़ा क्या है,
हमें यह शौक है देखें, सितम की इंतहा क्या है।
गुनहगारों में शामिल हैं, गुनाहों से नहीं वाकिफ,
सजा को जानते हैं हम,
खुदा जाने खता क्या है।
देश हित सोच है जिनकी, लहू उनका उबलता है,
देशभक्ति का लावा, उनके दिल में रोज़ बहता है।
मगर क्या हो गया है अब, हमारे देशभक्तों को,
कि दुश्मन देश में आकर, दहाड़ें मार जाता है।

ये भारत देश हम सबका, दंभ अभिमान गौरव है,
शहीदों के अमर बलिदानों की, दुर्लभ धरोहर है।
जिसे सींचा था अपने रक्त से, भारत के वीरों ने,
उसे दिल से सहेजें हम, ये हम सबकी जरुरत है।
आज इस देश के दिल पर, देशद्रोही गरज़ता है,
कोई साहित्य का दिग्गज, कलम से विष उगलता है।
मोल लगता शहीदों को, नमन पर बात करने का,
देशभक्ति के गीतों पर, कवि भी भाव करता है।

स्वयं को देश के मालिक, जो वर्षों से समझते हैं,
देश को लूटते छल से, प्रजा का मन कुचलते हैं।
शर्म आती नहीं हमको, उन्हें फिर फिर से चुनने में,
धर्म और जाति का विष, जो हमें दिन दिन पिलाते हैं।
चलो एक प्रण करें मिलकर, सभी बीड़ा उठाते हैं,
देश में ऐकता की तान पर, नयी धुन बनाते हैं।
भगत सिंह राजगुरु सुखदेव की, सौगंध है सबको,
धर्म और जाति के बदरंग, होली में जलाते हैं।

हमारी फिक्र हो हरदम, देश के प्रति वफ़ा क्या है,
हमारा शौक हो केवल, वफ़ा की इंतहा क्या है।
गुनाहों से रहें सब दूर, लेकिन देश के हित में,
ये दुश्मन को दिखा दें देश की, भक्ति का दम क्या है।

Sunday, February 28, 2016

देश गूंजता...

देश गूंजता गद्दारों की ज़हरीली आवाजो से,
करते हैं आघात ह्रदय पर तीखे स्वर में नारों से।
देशद्रोहियों की आज़ादी मांग रहे सरकारों से,
क्यों ऐसा विद्रोह हो रहा भारत के रखवालो से।।

जो भारत के भाग्यविधाता बने हुए थे सालों से,
पोल खुल रही दिन दिन उनकी सत्ता के गलियारों से।
शाख टूटती बात न बनती राजनीति के प्यादों से,
देश बचा लो शेर खाल में छुपे हुए इन सियारों से।।

देश धर्म कर रहे कलंकित देशद्रोह के कर्मो से,
साथ खड़े हो गद्दारों के पोषित हुए अधर्मों से।
देश उबलता गुस्से में इन जयचंदों की चालों से,
खुद को रखना दूर सदा तुम ऐसे दुष्ट दरिंदों से।।

मेरा एक सवाल आज इन झूंठे वतन-परस्तों से,
भारत खंडित करने वालों के साथ खड़े इन गुंडों से।
ज़ाहिर करो तुम्हारा रिश्ता उन नापाक पिशाचों से,
भारत माँ के शेर नहीं तुम करते काम शिखंडी से।।

संसद की सुन बहस ह्रदय बेजार हुआ जज्वातों से,
ऐसा लगता देशभक्ति भी हार गयी मक्कारों से।
तूती कैसे ताल मिलाये बड़े बड़े नक्कारों से,
देश बचाना होगा अब इन पापी राजकुमारों से।।

Sunday, November 29, 2015

छोड़ नहीं सकते..!

छोड़ नहीं सकते क्या अब हम,
जाति धर्म की बातें करना।
बर्बरता को संस्कृति कहकर
,
निर्दोषों का रक्त बहाना।।
जाति धर्म वर्णों की खातिर,
मानवता को घायल करना।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
,
बनकर जग में विष फैलाना।।
देश राष्ट्र राज्यों के होकर,
धरा-धर्म को दूषित करना।
भारत पाक चीन अमरीका
,
इंग्लिश रूसी क्यों कहलाना।।
नदी नीर, वसुधा उसका धन,
कभी न कहती किसको देना।
छोड़ नहीं सकते क्या हम भी
,
प्रकृति को अंकुश दिखलाना।।
देह द्वेष और काम क्लेश का,
द्वन्द्व दिलों में क्यों फैलाना।
नारी रहे पुरुष की दासी
,
क्यों विचार यह दिल में लाना।
धरती यदि हम सबकी माता,
क्यों न बंधु भाव से रहना।
रोक नहीं सकते क्या अब हम
,
दुनियाँ में नफरत फैलाना।।
-अशोक शर्मा

Monday, November 16, 2015

बचपन

सुबह सवेरे जल्दी उठकर
मात-पिता का वंदन करना।
नित्य क्रिया से निवृत होकर
स्वास्थ्य हेतु कुछ कसरत करना।
बहुत याद आते हैं वो दिन
निश्छल मन ईश्वर को जपना।
साफ़ स्वच्छ तन-वस्त्र पहनकर
माँ के प्रेमाशीष का मिलना।
विद्यालय की राह में मिलते
सभी बड़ों का आदर करना।
गुरु की सीख पिता का कहना
माँ का आँचल ही था गहना।
गलती करके डरे सहमते
माँ को सब कुछ सत्य बताना।
मात्र-प्रेम पाकर अबोध मन
सुबक सुबक कोने में रोना।
झूंठ बोलना पाप समझकर
सदा सत्य की बातें करना।
खूब लगाकर मन पढ़ने में
निडर - प्रखर - साहस से रहना।
याद बहुत आता है बचपन
कैसा था वह स्वप्न सलौना।
माँ की ममता और प्रेम से
संवर गया था जीवन अपना।

Friday, November 13, 2015

रहें पुष्प खिले गुलशन महके

सुख मिले सदा खुशियाँ बरसें,
ऐसी हों जीवन की घड़ियाँ।
रहें पुष्प खिले गुलशन महके,
गुलज़ार रहे अपनी दुनियाँ।।
जीवन का सार समय देकर,
इस रेल को सींचा है तुमने।
पत्नी - बच्चों माँ - बापू का,
कई बार हृदय तोड़ा तुमने।
पर रेल चले और देश बढे,
इस राह ना आने दी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------

जीवन भर अच्छे काम किये,
परहित को धर्म समझ तुमने।
कभी पुष्प मिले कभी खार मिले,
पर राह नहीं छोड़ी तुमने।
निज़ आदर्शों को ढाल बना,
कर लीं वश में सबकी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------
अब सेवा निवृत होकर तुम,
आज़ाद आज हो जाओगे।
जीवन के क्षण-क्षण की खुशिया,
अपनों को अब दे पाओगे।
बहने दो जीवन में अविरल,
खुशियों के अमृत की नदियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------

सौ वर्ष जिओ चिर-स्वस्थ रहो,
है ईश्वर से इतना कहना।
हम सबके सर पर भी अपना,
आशीष बनाये तुम रखना।
ऐहसास न हो कभी जीवन में,
हैं अपनी अलग अलग दुनियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------
हम सब मिलकर के आज तुम्हें,
स-हर्ष विदा कर देते हैं।
खुशियों से भरी विरासत को,
सींचेंगे वादा करते हैं।
इस प्रेम आल्हादित मौके पर,
मत आँख से बहने दो दरिया।।
रहे पुष्प खिले-----------------

रहें पुष्प खिले गुलशन महके

सुख मिले सदा खुशियाँ बरसें,
ऐसी हों जीवन की घड़ियाँ।
रहें पुष्प खिले गुलशन महके,
गुलज़ार रहे अपनी दुनियाँ।।
जीवन का सार समय देकर,
इस रेल को सींचा है तुमने।
पत्नी - बच्चों माँ - बापू का,
कई बार हृदय तोड़ा तुमने।
पर रेल चले और देश बढे,
इस राह ना आने दी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------

जीवन भर अच्छे काम किये,
परहित को धर्म समझ तुमने।
कभी पुष्प मिले कभी खार मिले,
पर राह नहीं छोड़ी तुमने। 
निज़ आदर्शों को ढाल बना,
कर लीं वश में सबकी कमियां।।
रहे पुष्प खिले-----------------
अब सेवा निवृत होकर तुम,
आज़ाद आज हो जाओगे।
जीवन के क्षण-क्षण की खुशिया,
अपनों को अब दे पाओगे।
बहने दो जीवन में अविरल,
खुशियों के अमृत की नदियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------

सौ वर्ष जिओ चिर-स्वस्थ रहो,
है ईश्वर से इतना कहना। 
हम सबके सर पर भी अपना,
आशीष बनाये तुम रखना। 
ऐहसास न हो कभी जीवन में,
हैं अपनी अलग अलग दुनियाँ।।
रहे पुष्प खिले-----------------
हम सब मिलकर के आज तुम्हें,
स-हर्ष विदा कर देते हैं।
खुशियों से भरी विरासत को,
सींचेंगे वादा करते हैं।
इस प्रेम आल्हादित मौके पर,
मत आँख से बहने दो दरिया।।
रहे पुष्प खिले-----------------