Sunday, December 28, 2014

सच कह दूँ तो...

सच कह दूँ तो जग रूँठे और झूँठ पचा नहीं पाओगे,
दुनिया को बद-रंग खेल से कैसे मुक्त कराओगे।
खुलेआम यहाँ क़त्ल हो रहा आज़ादी के सपनों का,
पैसे से क़ानून बिक रहा दाम लग रहा ज़ुल्मों का।
इस युग के क़ानून की आँखें सच से खोल न पाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................
मानवता का चीर हरण हर दिन होता चौराहों पर,
दुःशासन के ज़ुल्मों का चर्चा होता अखबारों पर।
तथाकथित भगवानों का दिल सच से बदल न पाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................
सच की ध्वजा हुयी ज़र्ज़र और झूँठ अज़र सा लगता है,
सत्य हुआ बे-ताज़ आज बस झूँठ राज ही चलता है।
झूँठ बोलकर क्या फिर से सच को ज़िंदा कर पाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................
धन-बल जिसके पास आज बस वही ठाठ से जीता है,
निर्बल है असहाय आज भी घूँट लहू के पीता है।
कैसे उसका अधिकार और सम्मान उसे दिलवाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................

Saturday, October 11, 2014

जीवन है नाम चुनौती का......

इंशान का जन्म मिला है तो, बाधाओं से मत घबराना।
जीवन है नाम चुनौती का, डरकर पीछे मत हट जाना।।
यूँ भी यह काय नश्वर है, श्वाँसों का मालिक ईश्वर है,
तुमको जो काम मिला जग में, प्रायोजक उसका भी रब है,
होगा या सफल नहीं होगा, इस चक्कर में ना पड जाना।
जीवन है नाम चुनौती का.......................... ।।
रिश्ते नाते धन संग सखा, केवल माया का बंधन है,
जन के प्रारब्ध समर्पण की, यह मामूली सी अड़चन है,
इन मिथ्या राग प्रपंचों में ही, उलझ कहीं मत रुक जाना।
जीवन है नाम चुनौती का.................................. ।।
हैं मतलब के दुनिया वाले, बे-वफ़ा हर एक अभिलाषा है,
मन वचन कर्म से पाक रहो, ईश्वर ही सच्ची आशा है,
परमेश्वर से यदि प्रेम किया, कुछ भी हो कैसा घबराना।
जीवन है नाम चुनौती का.………………………।।
क्या चाहत तुझको सता रही, क्यों मन में क्रोध हताशा है,
यह दुनियाँ है एक रंग मंच, तेरा अभिनय सत्य तमाशा है,
मन को रख शांत समझ खुद को, तेरी राह तुझे ही है चलना।
जीवन है नाम चुनौती का.……………………………।।
जब खाली हाथों आये थे, और छोड़ यहीं सब जाना है,
तो करो प्रतिज्ञा दुनिया के, किसी जीव को नहीं सताना है,
है अटल सत्य इस जीवन का, मिट्टी में एक दिन मिल जाना।
जीवन है नाम चुनौती का...........................................।।

Sunday, May 18, 2014

ज़िन्दगी की कसौटी

गम-ऐ-ज़िंदगी में अँधेरे हैं बे-शक,
मगर दूर तक तुमको जाना तो है ही।
भले राह-ऐ-मंज़िल में मुश्किल अनेकों, 
मगर हौसला करके चलना तो है ही।
जलाओ दिए सच के अन्तः करण में,
सुगम हो डगर ऐसी आशा तो है ही।
बनो साहसी नाम ईश्वर का लेकर,
हर हाल मंज़िल को पाना तो है ही।।
न दे साथ दुनिया कभी ग़म ना करना,
कदम-दर-कदम साथ रब का तो है ही।
सदा सोच में रखना जग की भलाई,
जहाँ में बुराई का आलम तो है ही।।
कभी धन से तौलो ना इंसानियत को,
नश्वर है जो उसको मिटना तो है ही।
कहाँ जग में आये थे दौलत को लेकर,
कफ़न में लिपट सबको जाना तो है ही।।
अँश ईश्वर का है चेतना सबके तन में,
उसी में विलय इसका होना तो है ही।
स्वयम कष्ट सहकर भी खुशियाँ लुटाओ,
सफल ज़िन्दगी में कसौटी तो है ही।।

Sunday, May 11, 2014

"माँ"

श्वासें तो ईश्वर ने दीं, पर तन तो माँ का दिया हुआ है।
प्रक्रति क़ी इस अज़ब कृति की, माँ ही तो आधार शिला है।।
 
ईश्वर ने दी भले चेतना, सिंचन माँ ने स्वयं किया है।
कोमल तन को बज्र बनाकर, माँ ने ही तो बडा किया है।।

 
बे-शक ज्ञान मिला गुरुओं से, पर माँ ने आधार दिया है।
कोरे तन-मन कच्चे घट को, माँ ने ही आकार दिया है।।
 
 दुनियां ने दी जटिल चुनौती, माँ ने हर वो वार सहा है।
सर्दी-गर्मी धुप-ताप में, आश्रय भी माँ ने ही दिया है।।

 
मुश्किल पल जब थे जीवन में, माँ ने सर पर हाथ रखा है।
छुपा कवच में आँचल के, तब माँ ने प्रेम अपार दिया है।।
 
बे-शक आज शिखर पर शोभित, नींव तो माँ का रखा हुआ है।
शोहरत का यह भव्य महल, उस माँ का ही आशीष फला है।।

 
मत करना वो काम कभी, जो माँ के दिल को दुःख देता है।
माँ को देकर कष्ट जहाँ में, सुखी बता दो कौन रहा है।।
 
मैं भी कहता आज वही, जो दिल पल पल महसूस किया है।
इस दुनियां में ईश्वर से भी, माँ का ही स्थान बड़ा है।।

Monday, April 14, 2014

भारत-वर्ष


मैली हो गयी राजनीति, क्यों देशभक्त पथ-भ्रम हो गए,

संस्कृति भारत वर्ष की बदली, क्यों आदर्श ख़तम हो गए।

छुआछूत थे चले मिटाने, जाति  - धर्म मैं क्यों खो गए,

मानवता और समता वाले, वादे कहाँ दफ़न हो गए।

राजनीति यदि सेवा है, क्यों लालच में नेता पड़ गए,

करें छल-कपट जनता से, क्यों झूंठ के वो आदी हो गए।

विद्यादान धर्म शिक्षक का, क्यों वह धर्मविमुख हो गए,

ऐकलव्य से अटल इरादे, शिष्यों के मन से कहाँ गए।

ऋषियों का यह देश था फिर क्यों, पापी आज सबल हो गए,

जिनको ब्रह्मऋषि कर पूजा, क्यों दिल को छलनी कर गए।

मात-पिता की सेवा से जहाँ, गणपति प्रथम पूज्य हो गए,

जननी-जनक से बढ़कर क्यों वहां, पत्थर के मंदिर हो गए।

माता कहकर पूजा जिसको, अबला कह रक्षक बन गए,

उसका ही अपमान हो रहा, क्यों हम मूक-बधिर बन गए।

दुष्चरित्र - दुर्जन - दुष्टों के, क्यों हम पक्षादार बन गए,

भ्रष्टाचार चरम सीमा पर, क्यों उसके अनुचर बन गए।

नक्सल और आतंकवाद से, डरकर चुप क्यों बैठ गए,

वीर शहीदों का सिर ले गए, दुश्मन को क्यों भूल गए।

रक्त नहीं अब तन में रहा क्यों, कायरता की हद कर गए,

भारत माँ के वीरों की क्यों, कुर्बानी को भूल गए।

मन विह्वल भाव विभोर, हृदय से इतने आज व्यथित हो गए,

अक्षम अधम तंत्र से हारे, क्यों अ'शोक हम सब हो गए।