Saturday, January 23, 2010

ग़ज़ल

वो चुल-बुली सी, नाज़ुक कली सी,
मिली थी कभी, इस फिजां में।
नया नाम लेकर, वो चेहरा बदलकर,
खिली आज फिर, गुल्शितां में॥
रखा था जिसे हमने, दिल में छुपाकर,
यादों की महफ़िल, में यूँ सजाकर।

सोचा नहीं था, कभी हम बिछुड़कर,

मिल जायेंगे यूँ, कहीं पास आकर।

मगर मिल गए हम, वही प्यास लेकर,

छोटे से इस जहाँ में...नया नाम.......
गुज़रा कभी जब, तेरे पास से तो,
कहा तूने कुछ, यूँ लगा।
तेरे होंठ चुप थे, फिर भी हमें क्यों,
बहुत कुछ सुना, यूँ लगा।
शायद दिलों ने, एक दूसरे को।
दी आवाज अपनी जुबां में...नया नाम....
जब दूर था तो, बहुत कहना चाहा,
नज़दीक आकर, न कुछ बोल पाया।
कहाँ से शुरू करके, क्या-क्या कहूँ मैं,
कुछ भी तो मेरी, समझ में न आया।
कहना तो चाहा, मगर कह न पाया,
मेरे दिल की वो दास्ताँ मैं...नया नाम...
बहुत कुछ था कहना, बहुत कुछ था सुनना,
मिली एक दिन फिर, हमें वो हसीना।
लगे बात करने, तभी टूटा सपना,
बीवी को देखा, तो आया पसीना।
मेरे दिल की हालत, तो नाजुक थी इतनी,

कुछ कर ही न पाया बयां मैं...नया नाम.....

बस यही सोचता रहता हूँ

इस देश की हालत देख आज,मैं हैरत मैं पड़ जाता हूँ |
जाने क्यों हम सब चुप है अभी,बस यही सोचता रहता हूँ||
जो जितना भ्रष्ट कुटिल पापी,उतना ही आदर पाता है|
सच के मार्ग पर चलता जो, वह पेट नही भर पाता है||
क्यों झूठ के सिर पर रखा ताज, यह कोई नही बतलाता है|
क्यों सत्य हुआ बे-ताज आज,बस यही सोचता रहता हूँ|। 

इस देश की हालत.............................................|||। 

कम कपड़ो में भारत की नारी,हीरोइन समझी जाती है |
जो सर पर आँचल ओढ़ चले,पिछडी कहलाई जाती है||
क्यों परम्परा दी छोड़ आज,ये बात समझ नही आती है|
क्या कपड़े का टोटा है यहाँ,बस यही सोचता रहता हूँ||
 
इस देश की हालत...........................................||2||

जो भ्रष्ट और हत्यारा है,संसद पहुँचाया जाता है|
क्यों सत्पथ के अनुयायी को,यहाँ टिकट नहीं मिल पाता है||
नेता अपने वादों से यहाँ,हर बार मुकरता जाता है|
फ़िर क्यों हम उसकी बात सुनें ,बस यही सोचता रहता हूँ ||
इस देश की हालत..............................................|||| 


जहाँ दूध की नदियाँ बहती थी,वह भारत देश हमारा है|
फ़िर पेप्सी-कोला को हमने, क्यों खुश होकर स्वीकारा है||
क्यों दूध के बदले बच्चों को, पेप्सी का दिया सहारा है|
क्या हमको इससे मिला आज, बस यही सोचता रहता हूँ||
इस देश की हालत.............................................||
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अंग्रेजी के स्कूलों ने बच्चों के,बदले हैं मिजाज| फ़िर
गुरुकुल शिक्षा का रिवाज ,बिल्कुल गायब क्यों हुआ आज||
अंग्रेजी तो अंग्रेजों की,फ़िर क्यों हम इस पर करें नाज़ |
क्या पहले से खुशहाली है,बस यही सोचता रहता हूँ||
इस देश की हालत...........................................||
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इस देश दशा को देख-देख,हर पल खोया सा रहता हूँ | 
जब वक्त नही कटता मेरा,बस कविता लिखता रहता हूँ||
दुनिया की दलीलें सुन-सुन कर,कुछ बोल नहीं दे पाता हूँ|
कविता मेरी कह दे कोई,बस यही सोचता रहता हूँ||
इस देश की हालत...........................................||||

हिंदू या मुसलमां

हिंदू हैं हम, या मुसलमां हैं हम,
हमें ही नहीं ये, पता क्या हैं हम,
चले थे कहाँ से, कहाँ पहुंचे हम,
मंजिल है क्या ,ये नहीं है इलम.....हिंदू हैं हम........

हिंदू को मारा,मुसलमां थे हम,
मुसलमां को मारा ,तो हिंदू थे हम,
हिंदू थे हम, या मुसलमां थे हम,
किसे हमने मारा, नहीं है इलम...........हिंदू हैं हम.........

जिसे हम कहें, ये हमारा वतन,
ये तो सोचो ,किया किसने इसका सृजन,
जिसने किया है, इसका सृजन,
उसी का जहाँ , है उसी का वतन......हिंदू हैं हम.........

ये कैसा सितम , और ये कैसे यतन,
ख़ुद ही करें, हम वतन का पतन,
सब तो हैं इसके, कर्जदार हम,
करते हैं क्यों, फिर इसी का हनन...........हिंदू हैं हम..........

न तो मन्दिर हैं हम,न ही मस्जिद हैं हम
उसी एक रब के, फ़रिश्ते हैं हम
हम को तो बांटा है, संसार ने ,
उसी पर यकीन, फिर क्यों करते हैं हम.........हिंदू है हम............

आओ ये मिलकर के, खायें कसम,
आपस में झगडा, करेंगे न हम,
रमजान में तो, मुसलमान हम,
होली में, हिंदू का परिवार हम...........हिंदू हैं हम..............

Thursday, January 21, 2010

मन-की-आशा

उनसे मिलने की, एक झलक पाने की,
हरदम है रहती, मेरे मन में आशा।
बस यही है ज़माने में, इस ज़िन्दगी की,
वो धूमिल सी आस, और प्यासी हताशा॥
वो जब थे तो रहती थी, इस ज़िन्दगी में,
गुलशन सी खुशबू, गुलाबों की ताज़ा।
हर - एक रात मानो, भरी चांदनी से,
सितारों की महफ़िल में, चन्दा हो राजा॥
हर-एक दिन सुहाना, थी हर-पल में मस्ती,
बसंती पवन जैसे, करती इशारा।
मेरे मन के सागर में, खुशियों की कश्ती,
वो करते थे, चुपके से उसका नज़ारा॥
मगर आज रूठा, वो हमदर्द हमसे,
ये दिल आज गुमसुम है, खोया हुआ सा।
ये आँखें हैं नम, उस जुदाई के ग़म से,
ह्रदय कांपता है, मेरा बेतहाशा॥
फिर भी है मन में, ये विश्वास पूरा,
फलेगी कभी तो, मेरी वो दिलासा।
रहेगा नहीं, मेरा सपना अधूरा,
मिलन से मिटेगी, मेरी वो पिपासा॥

Tuesday, January 19, 2010

काश की हर इंसान


काश की हर इंसान, कर्म को धर्म समझकर करता।
फिर क्यों मेरा देश आज, इस दावानल में जलता॥

रखवाला रक्षा करता यदि, रक्षक धर्म निभाता।
फिर क्यों ये आतंकवाद का, ग्रहण देश को लगता॥


यदि क़ानून बनाकर रखता, सबल-निबल में समता।
तो फिर क्यों मानवता रोती, सुजन दुष्ट से डरता॥

गर भ्रष्टाचार नहीं होता, कोई नहीं भूख से मरता।
दुर्बलता और लाचारी, फिर क्यों सहती बर्बरता॥


मानवता की परिभाषा, यदि मानव-वंश समझता।
भाषा, जाति, प्रान्त-वादों के चक्कर में क्यों पड़ता॥

स्त्री से ही पुरुष-पूर्णता, का यदि मर्म समझता।
फिर दहेज़ की ज्वाला में, क्यों बेटी का तन जलता॥


समय अभी भी गया नहीं है, फ़र्ज़ तुम्हारा बनता।
अच्छे कर्मों की कोशिश में, मिलती सहज सफलता॥

Sunday, January 17, 2010

बढ़ती-संख्या

आज जहाँ के लोगों की, कैसी फितरत हो गयी है!
मानव की बढती संख्या, मानवता निगल गयी है।।
भाई-भाई के बीच आज, देखो क्या रार ठनी है,
पिता-पुत्र में खूब आज, हो जाती तना-तनी है।
रिश्तों में कड़वाहट की अब, नहीं कमी रह गयी है॥
मानव की बढ़ती.........................
................1

पैसों के लालच में आज, शिक्षा व्यापार बनी है,
शिष्यों में गुरुवर के प्रति, आदर का भाव नहीं है।

गुरु-शिष्य की परिभाषा, बिलकुल ही बदल गयी है॥

मानव की बढ़ती............
2
इस देश के रक्षक ही भक्षक का, रूप धरे बैठे हैं,
मौका ज्यों ही मिला, उनहोंने खूब माल ऐंठे हैं।
ताबूतों को भी खा गए, अब कसर कहाँ रह गयी है॥
मानव की बढ़ती.........................
................3

मानव में मानव के प्रति, सेवा का भाव नहीं है,
मौंका बस मिल जाए उसे, फिर कुछ परवाह नहीं है।

खुद का तो खा रहे नज़र, औरों पर लगी हुयी है॥
मानव की बढ़ती.........................4
इस युग का मानव देखो, निज दुःख से दुखी नहीं है ,
औरो को सुख में देखे, तो होता खूब दुखी है।
कैसे किसको दुःख दें ये बात, हर दिल में बसी हुयी है ॥
मानव की बढ़ती.........................
................5

वर्तमान का यह मानव, अभिमान अधीन हुआ है,
मानव ही मानव के लिए , कितना संगीन हुआ है।

इस दुनिया में जीने की चाहत,अब बिलकुल नहीं रह गयी है॥
मानव की बढ़ती.........................
................६

Wednesday, January 6, 2010

हे मजदूर

हे मजदूर तेरे जीवन में, रहे सदा उत्कर्ष,

हर पल खुशियाँ बरसाए, यह नया सुहाना वर्ष।

यह नया सुहाना वर्ष, रखे तुम्हें स्वस्थ हमेशा,

प्रति-दिन प्रति-क्षण मिले तुम्हें, सुख सम्रद्धि और हर्ष।।

हर पल पुलकित हो तेरा मन, ऐसा हो स्पर्श,

अपनापन प्यार दुलार मिले, ना क्लेश रहे ना दर्द।

ना क्लेश रहे ना दर्द, रहो तुम सुखी हमेशा,

जीवन महके मधुबन जैसा, हो ऐसा ये नव वर्ष

दहशत का नमो-निशान हो, हो फ़र्ज़ तेरा आदर्श,

कुदरत का संग सुखदायी रहे, ना पैदा हों प्रतिकर्ष

ना पैदा हों प्रतिकर्ष, महक जाए जन-जीवन,

तेरी महनत से इस जग में, चमके भारत-वर्ष॥

Friday, January 1, 2010

बहरी दुनियां


सच को नहीं सुनेगी दुनियां, बनी हुयी बहरी है.
इसी लिए मरुथल को लिखता, नदी बड़ी गहरी है..
दिया झूंठ का संग, समझ सम्मान किया जायेगा.
रहा सत्य के साथ, सिरफिरा मान लिया जायेगा.
सत्य हुआ है कैद, झूँठ की ध्वजा यहाँ फहरी है.
सच को नहीं सुनेगी............................1.
कर छल-कपट-दगा-ह्त्या कर, और जमा कर धन को.
खुल्लम-खुल्ला रहें, तनिक ना शर्म रही नेतन को.
जोड़े धन को लोग कहेंगे, तेरी भलमनसाहत.
हंगामा यदि करें विरोधी, दे दो उनको राहत.
बे-खटके ना-काम सो रहा, स्वयं यहाँ प्रहरी है.
सच को नहीं सुनेगी.............................2.
ले बढ़ा बाहुबल अपना, और बना फ़ौज गुंडों की.
स्वयं पूज्य तू बन जायेगा, लगे लेन पंडों की.
इतना सब हो जाने पर, तू राजनीति के द्वारे जाना.
लेकर फर्जी वोट, जगह मंत्री की पाना.
ये नुस्खे मिल जांयें, समझ तू हुआ बहुत जहरी है.
सच को नहीं सुनेगी..............................3.
मणि-धारी तुम नाग, नगर में तक्षक बनकर रहना.
तुमको कौन मार सकता है, खुद को अमर समझना.
मीत बनाकर शहदमिता सी, जाने कितनी बाला.
जलकर राख मुठी भर हो गयी, तेरी हवस की ज्वाला.
क्या तोलेगी न्याय-तुला, तू नहीं आम शहरी है.
सच को नहीं सुनेगी...............................4.
फर्जी देकर साक्ष्य न्याय को, देओं करारा झटका.
बना झूँठ को सांच, मामला इंक्वारी में अटका.
तू धनपति-बलपति मंत्री, वो अबला बेचारी.
कौन टिकेगा तेरे आगे, तुझसे दुनियां हारी.
नक्कारों के बीच कभी, कोई तूती ठहरी है.
सच को नहीं सुनेगी..............................5.
रोज छपेगा नाम खबर में, काट खूब हंगामा.
बीच सदन में पहुँच, फाड़ दे कुरता और पजामा.
थर-थर कांपें लोग, कहेंगे तुझको राजा-भैया.
फूटे जन-आक्रोश कहोगे, मर गया मेरी मैया.
तभी लिखूं मरुथल को, मरुथल नहीं नदी गहरी है.
बना जटायु देख रहा सब, लोक-नाथ प्रहरी है.
सच को नहीं सुनेगी.............................6.
अशोक शर्मा

2003 में लिखी मेरे मन की व्यथा है, आज कुछ सोचते सोचते फिर से ताज़ा हो गयी.