Sunday, March 18, 2012

मैं रिटायर हो रहा हूँ

एक नयी सी ज़िन्दगी की राह पर,
अनजान सी पहचान लेकर चल पड़ा हूँ |
पहले सहमा कुछ मग़र अब,
स्वछन्द हूँ की मैं रिटायर हो रहा हूँ ||

आज तक दुनियां की भागम-भाग में,

ज़िन्दगी के गीत जो भूला हुआ था |
एक नयी धुन में सजाऊंगा उन्हें,
सोच करके में बहुत खुश हो रहा हूँ ||

पेढ़ पौधे फूल पंछी ये फिजायें औ नज़ारे,

ये समंदर आसमाँ ये झिलमिलाते चाँद तारे |
फिर नयी नज़रों से इनको देखकर,
साथ इनके ही मैं खुद को पा रहा हूँ ||

ज़िन्दगी की दौड़ में जब "अहम्" था,

जीत की ख्वाहिश में बस "हारा" रहा |
अब 'अहम्' को छोड़कर बस 'प्यार' है,
दिल की भोली ख्वाहिशों से मिल रहा हूँ ||

अनुभवों की ज़िन्दगी रिश्तों का मेला,

कर्मभूमि से "विदा" में ले रहा हूँ |
एस विरह-पल में तुम्हारे प्यार की आशा लिए,
आज फिर खुद में ही खुद को जी रहा हूँ ||

सब हैं जिसके और सब में जो समाया,

जिसकी माया ही निरंतर "प्राण"  है |
अब मिला है वक्त हाथों में जो कुछ,
खोज में उसकी स्वयं को पा रहा हूँ ||

आप सबका प्यार है सच्ची कमाई,

बाकी सब दो वक्त का खाजा रहा |
आज तक जो कह ना पाया था कभी,
आज वो सच्चे जिगर से कह रहा हूँ ||

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