Wednesday, November 7, 2012

"तुम्ही ने पुकारा"

न  देतीं  अगर  तेरी  यादें  सहारा,
खुदा जाने क्या हश्र होता हमारा।
रहा सोचता तेरे आँचल के नीचे,
बिगाड़ेंगे  तूफ़ान अब क्या हमारा।


मेरी राहें थीं जिससे रोशन हमेशा,
न जाने कहाँ खो गया वो सितारा।
तूफान  में  है  घिरी  मेरी  कश्ती,
नज़र भी नहीं आ रहा है किनारा।


कभी तुमने जिसको दिया था सहारा,
वही  आज  भी  हूँ  मगर  बे-सहारा।
बे-वफ़ा तुमको कहने की जुर्रत नहीं है,
मुकद्दर  ने  ही  साथ  छोड़ा  हमारा।

5 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

Sunder Panktiyan

Nihar Ranjan said...

गहरे भावों से ओत प्रोत है आपकी यह कविता. सुन्दर रचना.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बेहतरीन रचना एवं अभिव्यक्ति के लिए आभार

Anonymous said...

Bahut sundar

Ansuya Desai said...

Bahut sundar