Sunday, December 28, 2014

सच कह दूँ तो...

सच कह दूँ तो जग रूँठे और झूँठ पचा नहीं पाओगे,
दुनिया को बद-रंग खेल से कैसे मुक्त कराओगे।
खुलेआम यहाँ क़त्ल हो रहा आज़ादी के सपनों का,
पैसे से क़ानून बिक रहा दाम लग रहा ज़ुल्मों का।
इस युग के क़ानून की आँखें सच से खोल न पाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................
मानवता का चीर हरण हर दिन होता चौराहों पर,
दुःशासन के ज़ुल्मों का चर्चा होता अखबारों पर।
तथाकथित भगवानों का दिल सच से बदल न पाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................
सच की ध्वजा हुयी ज़र्ज़र और झूँठ अज़र सा लगता है,
सत्य हुआ बे-ताज़ आज बस झूँठ राज ही चलता है।
झूँठ बोलकर क्या फिर से सच को ज़िंदा कर पाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................
धन-बल जिसके पास आज बस वही ठाठ से जीता है,
निर्बल है असहाय आज भी घूँट लहू के पीता है।
कैसे उसका अधिकार और सम्मान उसे दिलवाओगे।
दुनिया को बद-रंग.........................................

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