Sunday, May 11, 2014

"माँ"

श्वासें तो ईश्वर ने दीं, पर तन तो माँ का दिया हुआ है।
प्रक्रति क़ी इस अज़ब कृति की, माँ ही तो आधार शिला है।।
 
ईश्वर ने दी भले चेतना, सिंचन माँ ने स्वयं किया है।
कोमल तन को बज्र बनाकर, माँ ने ही तो बडा किया है।।

 
बे-शक ज्ञान मिला गुरुओं से, पर माँ ने आधार दिया है।
कोरे तन-मन कच्चे घट को, माँ ने ही आकार दिया है।।
 
 दुनियां ने दी जटिल चुनौती, माँ ने हर वो वार सहा है।
सर्दी-गर्मी धुप-ताप में, आश्रय भी माँ ने ही दिया है।।

 
मुश्किल पल जब थे जीवन में, माँ ने सर पर हाथ रखा है।
छुपा कवच में आँचल के, तब माँ ने प्रेम अपार दिया है।।
 
बे-शक आज शिखर पर शोभित, नींव तो माँ का रखा हुआ है।
शोहरत का यह भव्य महल, उस माँ का ही आशीष फला है।।

 
मत करना वो काम कभी, जो माँ के दिल को दुःख देता है।
माँ को देकर कष्ट जहाँ में, सुखी बता दो कौन रहा है।।
 
मैं भी कहता आज वही, जो दिल पल पल महसूस किया है।
इस दुनियां में ईश्वर से भी, माँ का ही स्थान बड़ा है।।

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