Sunday, October 4, 2015

हे श्रष्टि के शिल्पकार

हे श्रष्टी के शिल्पकार तेरी कैसी अद्भुत माया।
पञ्च-तत्व से काया गढ़कर क्या क्या खेल कराया।
कोरा मन और कोमल तन को दुनिया में जब लाया।
इंसानों से मिलकरके वो भी इंसान कहाया।।
बुद्धि विवेक बढ़ा ज्यों ज्यों दुनियां का ज्ञान दिलाया।
मेरा - तेरा सिखा उसे सब दुनिया ने बहकाया।।
मानवता का ज्ञान दिया उसे लालच कैसे आया।
रिश्ते - नाते सगे सबंधों में कैसे उलझाया।।
नाशवान चीज़ों की खातिर अपनों को लड़वाया।
जाति - धर्म के चक्कर से क्यों अवगत उसे कराया।।
मानव में मानवता के संग दानव कैसे आया।
औरों की तो बात दूर खुद से भी विमुख कराया।।
बिन सोचे परिणाम, जहां में नफरत क्यों फैलाया।
बना विधाता बैठा है तेरी कैसी है ये माया।।
काश कि हो ये सोच सभी की, नश्वर है यह काया।
छोड़ यहीं पर जाना सब कुछ धन दौलत और माया।।
दिवस चार है जीना, जिसने अटल ज्ञान यह पाया।
प्रेम - पूर्ण माहौल बना जिस खातिर जग में आया।।

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