Thursday, November 5, 2015

जन - जीवन

चेहरों पर भाव मोहब्बत के,
दिल में नफरत छल-कपट भरा।
हर कदम कदम बस धोखे हैं,
रिश्तों के रक्त रंगी ये धरा।।

हर दिन खबरों का मेला है,
कोई यहाँ लुटा कोई वहां मरा।
पर सच तो है मानवता की,

नहीं फिक्र किसी को रही ज़रा।।
हो रही कलंकित मर्यादा,
हर रिश्ता है कतरा कतरा।
क्या अपने सर यह दोष नहीं,
दुनियाँ में आकर कुछ न करा।।

हर पल मैं - मेरा कर कर के,
अपने ही जीवन रंग भरा,
आने वाली पीढ़ी के लिए,
 

नहीं रंज-फिक्र मन में उतरा।।
यदि चाहो अब सुधरे समाज,
दिल से कर लो सहयोग ज़रा।
रिश्तों में घोर मलिनता है,
युग आये आदर प्यार भरा।।

सब छोड़ें अहम् भावना को,
हो जाति - धर्म से दूर ज़रा।
सबका जीवन सुखमय गुज़रे,
भयमुक्त रहे जन जीव धरा।।

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